Sunday, 14 September 2014

अब मैं क्या बताऊं जी !!



 देखते ही देखते फिर रविवार आ गया जी। हर सातवें दिन रविवार को आना ही है तो मैं इसकी प्लानिंग शनिवार को रात में ही कर लेती हूं जी। क्या है कि मेरे अंदर योग्यता तो नहीं लेकिन आलस ना कूट-कूट कर भरी है जी।

कल यानि शनिवार की रात सोने से पहले मैंने निश्चय किया कि रविवार को मैं तड़के सुबह उठूंगी। जब सूरज उगने से पहले अपने घर में सज-संवर रहा होगा। तब मैं जल्दी से उठकर कमरे से बाहर स्टूल (कुर्सी नहीं) निकालकर उस पर दोनो पैर ऊपर रखकर उकड़ू बनकर बैठ जाउंगी, और मुंह बाए..आंख ऊपर उठाकर सूरज को निकलते हुए देखूंगी जी। सूरज जब निकलता है ना तो उसे देखना मुझको बहुत अच्छा लगता है जी....कितना प्यारा रंग दिखता है उसका....लेकिन थोड़ी देर बाद जब धूप बिखरा देता है तो मुझे बिल्कुल अच्छा नहीं लगता। निकलता हुआ सूरज बिल्कुल ऐसा लगता है...जैसे सुबह-सुबह घर से तैयार होकर ऑफिस के लिए निकले लोग...खुशदिल...तरोताजा...।

कई महिनों से मैंने सूरज को ना तो उगते देखा और ना ही डूबते जी। जब सूरज उगता है उस वक्त मैं किसी जन्नत में पसरी खर्राटे भर रही होती हूं और जब सूरज डूबता है उस वक्त ऑफिस के काम में खट रही होती हूं जी।  अब मैं क्या बताऊं जी !!

लेकिन शनिवार की रात खराब होना शायद पहले से ही तय था जी। अब मैं क्या बताऊं....मैं बताऊंगी तो लोग कहेंगे कि परेशानियां हैं कि मोहतरमा का पीछा ही नहीं छोड़तीं।
हुआ यह जी कि...शनिवार की रात जब मैं गहरी नींद में थी, उसी वक्त कमरे में कुछ गिरने की आवाज आई। मैं तो एकदम से डर गई जी। मैं उठी, और मोबाइल का टॉर्च जलाकर देखी तो एक डिब्बा लुढ़ककर बेड के पास पड़ा था जी। उस वक्त मेरा दिमाग दुनिया भर के भूत-प्रेत और चुड़ैलों का दर्शन करके वापस लौट आया...लेकिन डिब्बा गिरने की वजह नहीं पता चली जी। थोड़ी देर बाद मैं लाइट बंद करके फिर सो गई । अभी नींद लगी ही थी कि किसी के चीखने की आवाज कानों में पड़ी जी। मैं तो इस बार बेहद डर गई। मैं झट से उठी और कमरे की लाइट जलाई...देखी तो दरवाजे (जो कि लकड़ी का है और नीचे से थोड़ा टूट जाने से एक छोटा सुराख हो गया है) के नीचे से करीब आधा किलो वजन वाला मालगोदाम परिवार का एक चूहा निकलने की कोशिश कर रहा था जी। लेकिन भारी-भरकम शरीर के चलते उसमें अटक गया था।

मेरी समझ में नहीं आया कि मैं इसे कैसे निकालूं...अगर दरवाजा खोलती हूं तो सुराख में चप जाने से चूहे का राम नाम सत्य हो जाएगा। अब मैं क्या बताउं जी !!!

फिर मैंने पीछे से चूहे की पूंछ को जैसे ही छुआ...मानो उसपर वज्रपात गिर गया कि एक मनुष्य ने उसे छूने का दुस्साहस कैसे कर दिया...वह शायद भड़क गया...और अपने शरीर को पीछे की ओर धकेला और फिर से कमरे में आ गया। निकलने के बाद वह वहीं बैठा मुझे एक टक देखता रहा जैसे कह रहा हो कि कम से कम एक गिलास पानी तो पिला दो। बताओ जी....भला ऐसे भी चूहे होते हैं क्या...जो इंसानों को एक टक घूरते हों!!!

खैर, मैंने कमरे का दरवाजा खोल दिया और मोटू मल उसैन वोल्ट की रफ्तार में भाग गए। लेकिन इनके चलते मुझे दुबारा नींद नहीं आयी, और मैं सुबह होने का बेसब्री से इंतजार करने लगी। फिर तड़के सुबह ही मैंने कमरे का दरवाजा खोला....स्टूल बाहर निकाली...दोनों पैर ऊपर रख उकड़ू बन....मुंह बाए...आंख ऊपर उठाए...सूरज के निकलने का इंतजार करने लगी। लेकिन जुल्म की हद तब हो गई..जब खराब मौसम के चलते सूरज सात बजे तक नहीं निकला....बैठे-बैठे मुझे जोर की नींद आने लगी...फिर मैं कमरे में आकर लुढ़क गई....बाद में विश्वसनीय सूत्रों से पता चला जी कि सूरज साढ़े आठ बजे निकला। मुझे तो यह सूरज और चूहे की मिलीभगत लगती है जी। अब मैं क्या बताऊं जी।

Thursday, 11 September 2014

घर से दूर..दिमाग का दही...नमक कम



घर से दूर एक ऐसे शहर में किराए का कमरा लेकर अकेले रहना, जहां से अपन के सारे दोस्त पलायन कर गए हों, जिंदगी किराए के कमरे और ऑफिस में कैद हो कर रह गई हो, तब कभी-कभी बेवजह की झुंझलाहट होती है। हम नकारात्मकता की नदी में गिर जाते हैं। ना ही ऑफिस का काम पसंद आता है और ना ही अपना बनाया खाना। पागल कर देने की हद तक दिमाग में वो सारी बातें आती हैं जो कभी भी हमें आगरा, रांची या बनारस के पांडेयपुर भेज सकती हैं। 

तब हम अपनी जिंदगी से सारी आह निकालने के लिए अहा जिंदगी जैसी मैगजीन में सकारात्मक बातें पढ़ते हैं। मन कुछ ठीक होने पर सोचते हैं चलो...आज जिंदगी जीते हैं....बढ़िया खाना बनाते हैं..मन लगाकर....जब खाना और बनाना खुद ही है...तो आज कुछ ढंग का पकाते हैं....यही सोचते हुए हम जेब से पैसे निकालते हैं और दुकान से पनीर ले आते हैं....इसके बाद-

-दो-चार प्याज, लहसुन, अदरक छीलकर बारीक काटते हैं, फिर उसे गिलास में रखकर बेलन के कूचकर उसका पेस्ट बनाते हैं (बता दें कि फिलहाल घर में मिक्सर या सील-बट्टा जैसी कोई व्यवस्था नहीं है)
इस दरम्यान बिजली चली जाती है और प्याज-लहसुन का पेस्ट बनाते-बनाते हम पसीने से इतने तर-बतर हो जाते हैं मानो किसी ढाबे पर कोयले की आंच पर खाना पका रहे हों।
-कढाई में तेल डालते हैं....पनीर को हल्का भूरा होने तक फ्राई करते हैं...फिर पनीर को प्लेट में निकालकर प्याज-लहसुन आदि का पेस्ट धनिया पावडर हल्दी वगैरह कढाई में डालकर धीमी आंच पर पूरे मसाले को भूनते हैं।
- टमाटर या पालक का पेस्ट डालते हैं..सब अच्छे से पक जाने पर उसमें पनीर डाल देते हैं
इतना करने में गर्मी के मारे हम पसीने से भीग जाते हैं...मानो किसी ने नदी में धकेल कर मुझे बाहर निकाल दिया हो।
- हम आटा गूथकर दो-चार रोटियां सेंकते हैं.....
थोड़ी ही देर में खाना बनकर तैयार।

जब सब कुछ बनकर तैयार हो जाता है तो सोचती हूं क्यों न नहा कर ही खाना खाऊं......बाथरुम में बतौर बाथरूम सिंगर गाते हुए आधे घंटे बाद नहाकर निकलती हूं। और पालथी मारकर जमीन पर खाने बैठती हूं
उफ्फ....पनीर में नमक ही नहीं...एक ही बार में मुंह फीका सा हो गया।
हाय राम....सारी मेहनत बेकार....किसी और को खिलाती तो दस गालियां देता।
मैं लौटकर आधे घंटे पहले कि दुनिया में जाती हूं....तो पता लगता है कि पनीर बनाते वक्त तो मैं किसी से फोन पर भी बात नहीं कर रही थी...कुछ सोच भी नहीं रही थी...फिर नमक डालना कैसे भूल गई।
खैर...पनीर में नमक मिलाई और फिर खाने बैठ गई। लेकिन स्वाद खतम हो जाता है ना...जब हम खाने में ऊपर से नमक छिड़क कर खाते हैं।
 
*हमारे यहां जब खेतों में काम करने वाले मजदूरों को खाना खिलाया जाता, तब वे नमक मांगते..यह कहते हुए कि सब्जी में नमक या तो डाला नहीं गया या कम है। लेकिन उसमें से एक मजदूर कभी नमक नहीं लेता...कम रहने पर भी। वह कहता....हम खाने में ऊपर से नमक डालकर नहीं खाते....यह खाने का स्वाद बिगाड़ देता है। पकाते समय ही नमक ठीक से डाला करो।

Sunday, 7 September 2014

रविवार कुछ यूं बीतता है.....

हर शनिवार की रात यह तय करके सोती हूं कि सुबह एकदम जल्दी या बहुत देर से उठुंगी। फिर फटाफट कपड़े-लत्ते धोकर, नहा  और खाना खाकर रविवार ऐसे मनाऊंगी...कि हफ्ते भर की दिमाग में जमी गंंदी चीजें साफ हो जाएं...मन तरोताजा हो जाए...और अगला हफ्ता बढ़िया बीते। क्यों न मूवी देखने चली जाऊं....थोड़ी बहुत शॉपिंग कर लू...कुछ भी कर लूं...झक्क ही मार लूं...लेकिन घर से बाहर निकलकर...घर में बैठकर नहीं...।
खैर....कहानी यहां से बनती है कि सोचा हुआ घर का काम तो समय से निपट भी जाता है। नहा भी लिया....सब कुछ तैयार। लेकिन मियां दोपहर का भोजन करने के बाद ऐसी नींद आती है न कि दिमाग का सब खुरापात सुत जाता है। आंखें बंद लेकिन चौकन्ना दिमाग यही कहता है कि दुनिया में नींद से प्यारी कोई चीज नहीं...चाहे वो घूमना ही क्यों न हो। दो-चार दोस्त जिनसे कि फोन पर पहले से ही यह तय रहता है कि फलाना टाइम घूमने चलना है...मोबाइल पर घंटियां मारकर थक जाते है...और मोबाइल दर्द के मारे बेचारा बेड से सीधे जमीन पर लुढ़क जाता है....फिर भी नहीं खुलती दोपहर की ये निद्रा।
जब शाम होती है तो लगता है रविवार तो खत्म...अब क्या जाएं घूमने। इस समय नींद नहीं आलस जकड़ती है। हम एक कप चाय लेकर कमरे से बाहर निकलते है.....मकानमालिक के बूढ़े पिता को देखते हैं......जो रोज ही ऐसा नीरस दिन गुजारते हैं....भगवान को याद दिलाते हैं कि वह उन्हें भूल गए हैं....। मकानमालिक के बच्चे शाम को खेलते हैं.....लड़ते-झगड़ते भी है....उन्हें ऐसे देखना....उन्हें सुनना...और एक कप चाय खत्म करना...मतलब हो गई शाम खत्म।

सच बताऊं तो मुझे पीली रोशनी से बहुत कोफ्त होती है। अंधेरा होते ही पीली रोड लाइड जल जाती है। ऐसी लाइट जिसमें सब कुछ दिखते हुए भी कुछ नहीं दिखता....घर के अंदर नीम का जो पेड़ है...वह भी काला और बूढ़ा दिखता है इस पीली रोशनी में....। रविवार को सब नीरस लगता है...बेजान भी। और यह कमरा....इसको कोई करीने से सजाने वाला होता तो खराब मूड के चलते इसे हम तहस-नहस कर देते। बस प्यारी लगती है तो रविवार के दोपहर की नींद...चाहे आप राजमा-चावल खाकर सोएं...चाहे दाल-भात , चोखा-चटनी। कोई तय समय नहीं होता उठने का।

बस..दारू की कमी थी...



कोई कहता कि लड़कियों का कमरा गजल की तरह सजा होता है तो यह बात उसे मिथ्या लगती। थी तो वह खुद भी एक लड़की। लेकिन अपने को दूसरी लड़कियों से अलग नहीं मानते हुए भी जाने कैसी थी। ऑफिस से आने के बाद कभी बेड पर तो कभी जमीन पर यूं ही पसर जाती, पैर में जूते वैसे ही बंधे होते...और वह लेटे-लेटे कल्पना करती कि कोई आकर उसके जूते खोल रहा है...उसके माथे को हल्का सा सहला कर उसे गरम चाय का प्याला दे रहा है। लेकिन कौन....कोई तो नहीं था। वह उठकर बैठने की कोशिश कर रही थी...तभी उसके पैरों से लगकर पानी का बोतल गिर गया....वह उसे वैसे ही बेतरतीब छोड़ कर ऑफिस गई थी...जैसे कमरे का बाकी सामान.....बोतल गिरते ही पानी ठीक उसकी तरह ही जमीन पर पसर गया...वह उठी...और म्यूजिक सिस्टम पर अपना मनपसंद गाना चला दी। कपड़े निकालकर कोने में पड़े कपड़ों के गट्ठर पर धीरे से फेंक दिया....और अपने कमरे को एक तरफ से निहारने लगी। एक तरफ सभी जूठे बर्तन...साफ-सुथरे कपड़े लेकिन उनका कोई सलीका नहीं...यूं ही एक के ऊपर एक लदे हुए...कमरा उतने ही दूर का साफ जितनी जगह पर वह जमीन पर चटाई बिझाकर पसरती थी...बेड पर ईयरफोन, हेडफोन, लैपटॉप, माउस वगैरह को कायदे से सुलाया गया था...। वह सिर्फ वही बर्तन साफ करती जिसमें उसे कुछ बनाना होता। अगला दिन छुट्टी का था...वह सोच रही थी....क्या, कितना और कैसे साफ करे। किसी ने उसे कहा था...ऐसे तो लड़के रहते हैं यार...तुम्हारे जीने में सिर्फ एक कमी है....कि तुम्हारे कमरे में दारू की बोतल नहीं दिखती...बिखरी हुई, टूटी हुई...बेतरतीब।