Tuesday, 7 July 2015

मैं..मेंढक..कमरा..टर्र टर्र



क्योटो में तेज बारिश हो रही है और सारे मेंढक फुदक-फुदक कर मेरे कमरे में आ रहे हैं। पहले एक आया फिर तीन फिर एक.. और फिर आने का सिलसिला शुरू ही हो गया। मानो इनके लिए कमरे में निःशुल्क जलपान की व्यवस्था की गई हो। 
 
लगता है आज मेंढकों के पदार्पण से मेरे कमरे में महफिल जमेगी। सभी टर्र..टर्र..टर्र करेंगे और मैं कहूंगी यार ये पुराना हो गया अब इसका रीमिक्स सुनाओ, हिमेश रेशमिया टाइप।
मैं पालथी मारकर अपने बेड पर आराम से बैठी हूं और गिन रही हूं कि कुल कितने मेंढकों ने मेरे कमरे में प्रवेश लिया। मेंढक सिर्फ देखने में ही अच्छे लगते हैं। गलती से भी छू जाने पर लगता है इनके अंतड़ियों तक अपन की उंगली पहुंच गई।

हां..तो मैं बैठकर मेंढ़कों की संख्या गिन रही हूं..ताकि इन्हें कमरे से भगाने में आसानी रहे। लेकिन ये तो लगातार चले ही आ रहे हैं...गजब की लाइन लगी है..सभी टर्र टर्र कर रहे हैं..जैसे मनरेगा का मानदेय थोड़े ही देर में ही मिलने वाला हो...अब पेन-कॉपी लेकर बैठना पड़ेगा..संख्या कुछ ज्यादा ही हो रही है।

मैंने बैठे-बैठे सभी मेंढकों को बेड के नीचे जाते देखा..लेकिन बेड के नीचे गर्दन लटकाकर देखा तो एक भी मेंढक नहीं...सब के सब गायब। मैंने हाथ में झाड़ू लिया और ये बोलते हुए कि किधर छुप गए बे सब के सब (यह जाने बगैर की इसमें कुछ फीमेल भी होंगी)। लेकिन चूं तक की आवाज नहीं आई..ओह..सॉरी टर्र तक की आवाज नहीं आई। मैं झाड़ू लेकर कमर पर हाथ रखकर खड़ी रही..तभी एक मेंढक निकला। मैंने ध्यान से देखा..और उधर बढ़ी। हाय रे..कलमुहे सारे के सारे कुकर में बैठे थे। दो जने कटोरी में बैठे थे। एक बेलन के ऊपर बैठा था..मानो कूदकर सुसाइड करने वाला हो।

मैंने सारे मेंढकों को झाड़ू मारकर भगाया...गिन गिन कर भगाया...सभी टर्र टर्र करते हुए कमरे से निकल गए..बिना रीमिक्स सुनाए ही..अब तक बारिश भी बंद हो गई।