बुधवार, 27 जुलाई 2016
आलू का परांठा..मां..याद
चार साल का वह छोटा लड़का
अपने घर की बालकनी में खड़ा होकर आलू का परांठा खा रहा था। लड़की उसे अपने हॉस्टल
के कमरे की खिड़की से देख रही थी। लड़का पराठे को हाथ से तोड़-तोड़कर खा रहा था।
उसने अगली बार परांठे को तोड़ा तो उसमें भरा आलू थोड़ा सा जमीन पर गिर गया। लड़का
परांठा खाते-खाते ही कोई कविता याद कर रहा था.. वह हिल-डुल रहा था..नाच रहा
था..कविता रट रहा था और परांठा खा रहा था। थोड़ी देर बाद परांठा खत्म हो गया और
लड़का...मां एक और देना..बहुत अच्छा लग रहा है.. कहते हुए किचन में चला गया।
खिड़की के पास खड़ी लड़की
का मन रूआंसा हो गया। वह परांठे की खुशबू को महसूस कर रही थी। परांठे से आलू का
गिरना उसे अपने घर और मां की याद दिला रहा था। वह अपने घर पर ऐसे ही खड़े होकर आलू
के परांठे खाया करती थी। मां कितनी बार कहती कि प्लेट में परांठे रखकर खाए..बैठकर
आराम से खाए..लेकिन वह मां की बातें न सुनती और गर्मागरम परांठे अपने आंगन में
टहल-टहल कर खाती..कभी चारपाई पर भी बैठ जाती..लेकिन एकदम से बैठकर न खाती।
जब परांठे से थोड़े आलू
जमीन पर गिर जाते थे तो उसे कौवा और चिड़ियां उठा ले जाते। यह देखकर उसे बड़ा मजा
आता। वह अगर ज्यादा से ज्यादा परांठे खाती तो मां का दिल गद्गद हो उठता। फिर भी
मां कहती..एक-दो और खा लो। जैसे उसके ज्यादा परांठे खाने से ही मां का पेट भर जाता
था।
वह इन्हीं खयालों में खोई
हुई थी कि लड़का दूसरा परांठा लेकर फिर से बालकनी में आ गया। खिड़की में खड़ी
लड़की उस छोटे लड़के से जोर से बोली-अपना परांठा मुझे भी दोगे।
-लड़का बोला-नहीं।
वह बोली-मेरी मां भी बहुत
टेस्टी आलू के परांठे बनाती है।
-लड़का बोला-तो अपने घर ही
जाकर खाना, मैं अपना नहीं दूंगा।
लड़की बहुत मिस कर रही थी
मां को, परांठे को, घर के आंगन को।
सोमवार, 18 जुलाई 2016
जब नींद आयी तो ऐसे आयी...
मैं पिछले दो घंटे से लाइब्रेरी में बैठी हूं। लेकिन जब से बैठी हूं तभी से
मुझे जोरों की नींद आ रही है। मैं अपनी चारों तरफ यह देख रही हूं कि कोई मुझे देख
तो नहीं रहा कि मैं आते ही सोने लगी। अब तक मैंने एक अक्षर भी नहीं पढ़ा है।
नींद इतनी तेज कि मेरा सिर अपने आप डेस्क पर पटका जा रहा है। इसे सुख की नींद
कहते हैं शायद, मतलब सब कुछ भूल कर सोना। लेकिन यहां तो सोने की कोई जगह ही नहीं
है। यह नींद बेचैनी वाली नींद साबित हो रही है।
लाइब्रेरी आने से पहले मैं हॉस्टल में खाना खाकर डेढ़ घंटे तक सोई रही। फिर
उठी तो तैयार होकर यहां आ गई। लेकिन नींद तो साथ में ही चली आयी। लगता है यह नींद
सुलाकर या फिर रूलाकर मानेगी। क्या करूं...क्या करूं...दिमाग इसी उधेड़बुन में है।
लाइब्रेरी में सोना बिल्कुल अलाऊ नहीं है। किसी ने डेस्क पर अपना सिर झुकाया
नहीं कि कहीं से एक बुलंद आवाज सुनाई देती है..फौरन निकलिए बाहर...यह सोने की जगह
नहीं है। क्या यह आवाज भगवान की थी...नींद में झूल रहे व्यक्ति को उस वक्त ऐसा ही
लगता है..क्यों कि बुलंद आवाज में बोलने वाला कहीं दिखाई नहीं देता है।
मेरी नींद चरम पर है। मुझे सबकुछ धुंधला सा दिखाई दे रहा है। मैं हॉस्टल वापस
चली जाऊं..क्या करूं..कुछ समझ में नहीं आ रहा। तीखी धूप है...ऊपर से लाइब्रेरी से
मेन रोड की दूरी एक किमी है..वहां तक पैदल जाने के बाद भी कोई रिक्शा मिलने की
संभावना है। इस धूप में निकलने की हिम्मत नहीं हो रही लेकिन नींद का क्या करूं।
मैं उठती हूं और बाहर नल के पास जाकर आंखों पर पानी के छींटे मारती हूं। इसके
बाद भी आंखें चिपकी जा रही हैं। अचानक इतनी नींद क्यों और कैसे आने लगी..कुछ समझ
में नहीं आ रहा। घर के बाहर भी ऐसी नींद आती है बिना किसी वजह के मुझे अब समझ में
आ रहा था। मुझे ऐसा लग रहा था जैसे पूरी रात जगकर मैं किसी की शादी में मंत्र
पढ़कर आयी हूं। इतनी नींद कि लाइब्रेरी में बैठे हर चेहरे सिर्फ धुधले रंगों में
दिख रहे हैं।
अब मुझे शक हो रहा है कि कहीं मेरी
रूम मेट ने चाय में नींद की गोली डालकर तो नहीं पिला दी मुझे। मैं उड़द की दाल
खाकर भी नहीं आयी थी जो एसिडिटी की वजह से नींद आ रही हो।
मैं उठती हूं और थोड़ी देर लाइब्रेरी से बाहर निकलने की सोचती हूं। मैं बाहर
निकलकर लाइब्रेरी के गेट तक पहुंचती हूं कि पेड़ से दो जामुन मेरे सिर पर गिरता
है। बाहर काफी ग्रीनरी है...यह सब देखना आंखों को राहत देने जैसा है। मैं थोड़ी
दूर जाकर एक पत्थर पर बैठ जाती हूं। थोड़ी
देर बैठने के बाद मैं लाइब्रेरी वापस आ जाती हूं। लेकिन फिर भी राहत नहीं..कुछ देर
बाद मुझे फिर वैसे ही नींद आने लगती है। अब नींद भगाने के लिए मेरे पास कोई उपाय
नहीं है।
कुछ लोगों को देखा है कि जब नींद आने लगे तो वे लिखने बैठ जाते हैं...पढ़ते
वक्त नींद ज्यादा आती है जब कि लिखते वक्त उससे कम। अब मैं लिखने बैठ जाती
हूं...तो आंखें धीर-धीरे खुलना शुरू हो जाती हैं। नींद में लिखी गई पोस्ट आपके
सामने है।
शनिवार, 16 जुलाई 2016
चांद..आशिक और छत
छत पर आओ न, मुझे तुम्हें देखना है।
-अच्छा जी! अगर मैं तुम्हारे
हॉस्टल के सामने नहीं रहता तो कैसे देखती मुझे?
वो मुझे नहीं पता, बस तुम अपनी छत पर आ जाओ।
-लो बाबा, आ गया..अब खुश !
हां..बहुत खुश..आसमान में उस चांद को देखो..कितना प्यारा लग रहा है।
-हां..प्यारा तो लग रहा है..
नहीं..ऐसे मत देखो
-फिर कैसे
पहले चांद को देखो, फिर उसके किनारे रोशनी से बनी धुंध को देखो।
-हां..देख तो रहा हूं।
नहीं..ऐसे नहीं
-फिर कैसे?
पहले चांद को देखो..फिर उसके किनारे की धुंध को देखो..और फिर उसके बगल में जो
चमकीला तारा बैठा है उसे देखो।
-अरे वाह...चांद तो वाकई प्यारा दिख रहा है।
चांद प्यारा ही नहीं बहुत प्यारा लग रहा है, लेकिन तुम इसे ऐसे मत देखो।
-फिर कैसे?
ये जो चर्च दिख रहा है न पहले इसकी मिनार देखो, फिर उसके ऊपर चांद और बगल में
बैठे तारे को देखो। मिनार, चांद और तारे को एक ही फ्रेम में रखकर देखो। इसके अलावा
कुछ न देखो।
देखो न..कितनी प्यारी सीनरी है ये। जैसे बचपन में हम ड्राइंग बनाया करते थे।
कोई घर होता था फिर उसके ऊपर काली रात बनाते थे फिर ठीक ऐसे ही चांद और बगल में एक
चमकीला तारा।
-लेकिन मुझे तो चांद के बगल में बैठा यह तारा ऐसे दिख रहा है मानों तुम्हारे गाल
का तिल हो।
नहीं..तुम इसे तिल मत बनाओ..इसे ऐसे देखो जैसे बचपन में बनायी गई कोई पेंटिंग
हो।
-सच.. तुम पगली हो रे।
किताब, बादल, संगीत और मूड...
रूममेट से किसी बात की लेकर बड़ी वाली बहस हो गई और उसने मुंह फुला लिया।
थोड़ी ही देर में कमरे का तापमान बदल गया। अब कमरे में रहना ऐसे लगने लगा जैसे
भूसे के घर में बैठी हूं..दम घुट रहा था। पत्नी से लड़ाई करने के बाद जिस तरह पति
थोड़ी देर के लिए घर से बाहर रहना चाहता है वैसे ही मैं भी हॉस्टल के कमरे से बाहर
निकलना चाह रही थी।
दोपहर के तीन बज रहे थे। मैंने एक किताब उठायी साथ में एक बोतल पानी और एक
चादर और हॉस्टल की छत पर चली गई। छत पर खड़ी दीवार के पीछ धूप सिमट चुकी थी। बैठने
के अलावा पसरने भर की छाया भी वहां मौजूद थी। मैंने वहीं अपनी चादर बिछायी और
लेटकर अनुराधा बेनीवाल की किताब आजादी मेरा ब्रांड पढ़ने लगी।
इस दौरान अचानक ही मेरी आंखें बादलों पर पड़ी और मैं डर के मारे उठकर बैठ गई।
काले बादल चिमनी के धुएं की तरह उमड़-घुमड़ रहे थे। उन्हें देखकर ऐसा लग रहा था
जैसे थोड़ी ही देर में ये मेरे ऊपर गिर पड़ेंगे। बादल चल रहे थे और पल-पल भर में
काले से सफेद और फिर नीले हो जा रहे थे।
बादलों को थोड़ी देर निहारने के बाद मेरा डर यह डर खत्म हो गया कि मैं इनके
नीचे दबने वाली नहीं हूं। मुझे इनसे डरने की बजाय क्षण भर में बन और बिगड़ रहे इन
बादलों के रंगों को लेटकर देखना चाहिए। मैं किताब किनारे रखी और चादर पर दोबारा
लेट गई। इस बार बादल मुझे सुंदर दिखने लगे। थोड़ी ही देर बाद जाने क्या हुआ कि फिर
से धूप निकल आयी और हवा चलने लगी। हवा तेज थी इसकी वजह से छत पर कोने में रखी बालू
बिखरकर मेरे बालों और चादर पर आ पड़ी। अब मुझे उठकर बैठना पड़ा।
मैंने किताब उठाई और फिर से पढ़ने लगी। आजादी मेरा ब्रांड पढ़ते हुए मैं भारत
में कहां थी, मैं तो लेखिका के साथ ही विदेशों का भ्रमण कर रही थी। उस वक्त में
किताब में लिखी विदेश के किसी शहर की कला और संगीत के बारे में पढ़ रही थी कि छत
पर किसी के आने की आहट सुनाई दी।
मैंने पलट कर देखा तो एक लड़की छत पर चादर बिछाकर तबला बजाने का रियाज करने जा
रही थी। इधर मैं छत पर लेटी हुई विदेश की कला और संस्कृति के बारे में पढ़ रही थी
कि किसी भीनी-भीनी खुशबू की तरह तबले की आवाज कानों में पड़ने लगी। वाह...पल भर
में ही सबकुछ अद्भुत सा हो गया। मैं तो कहीं खो ही गई। इतने सुख और शांति की आशा
करके तो मैं नहीं आयी थी न छत पर।
आसमान में काले-घुमड़ते बादल, बादलों के नीचे छत पर लेटी लड़की, लड़की की हाथ
में आजादी मेरा ब्रांड जैसी किताब, सिरहाने से आती तबले की आवाज, हवा में उड़ते
खुले बाल। वाकई..ये सुबह तो नहीं थी..लेकिन सबकुछ सुबह सा क्यों महसूस हो रहा था।
मन ऐसा ताजा हो गया मानों मैंने थोड़ी देर पहले मेडिटेशन किया हो। सबकुछ बहुत ही
सुहाना था। आज अपनी शाम बन गई।
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