वह शहर भर के रास्तों को जब
नापती है तो उसे इस बात का गुमान होता है कि आगे न सही लेकिन उसके आगे पलाश का
पेड़ जरूर दिखेगा। लेकिन मानो शहर ने पलाश को पलायन का रास्ता दिखा दिया हो। वह
निराश हो जाती है। वह रास्ते में जहां कहीं भी छह-सात पेड़ों का झुंड देखती है,
देखती ही जाती है, मुड़-मुड़ कर देखती है कि उन पेड़ों के बीच से कहीं पलाश न
झांककर उसे देखे। वह दीदार करना चाहती है तो सिर्फ पलाश के फूलों का। वह उन फूलों
को अपने में समा लेना चाहती है। वह दीवानी है तो बस पलाश के फूलों की।
शनिवार, 27 फ़रवरी 2016
पलाश की दीवानी
बुधवार, 27 जनवरी 2016
फुदक-फुदक कर आयी चिड़िया!
सुबह वॉक पर जाते समय रास्ते में एक घर पड़ता है। उस घर में दो सफेद और रेशमी
बाल वाले कुत्ते रहते हैं। सुबह वे दोनों कुत्ते घर के बाहर अकेले टहलते दिख जाते
हैं। एक दिन अचानक उन कुत्तों पर नजर पड़ी तो देखा कि दोनों कुत्तों के माथे पर
गहरे काले रंग का लंबा सा टीका लगा हुआ था। उस वक्त दोनों कुत्ते अपनी पूंछ हिलाते
हुए सड़क पार कर रहे थे। उनके माथे पर टीका देखकर मुझे हंसी आ गई। मेरे साथ चल रही
एक आंटी ने बताया कि इन कुत्तों को लोगों की नजर लग जाती है और ये बीमार पड़ जाते
हैं इसलिए इन्हें नजर से बचाने के लिए काजल का टीका माथे पर लगाया गया है।
मां भी तो ऐसा ही करती है न। अपने बच्चों को बुरी नजर से बचाने के लिए उसके
माथे पर टीका लगा देती है।
मेरे घर के आंगन में दो चिड़िया आया करती थीं। दोनों के पैर में एल्युमिनियम
के तार पहनाए गए थे। जब भी चिड़िया आंगन में आकर चावल चुगती..हम लोग जोर से
चिल्लाते कि देखो पायल वाली चिड़िया आ गई। उन्हें देखकर बड़ा मजा आता था। पैर में
एल्युमिनियम का पायल पहनने की वजह से वे अन्य चिड़ियों से थोड़ा अलग दिखा करती
थीं। हमारे मुहल्ले में एक चाचा के घर जब मुर्गी ने अंडे दिए और जब उसमें से चूजे
निकले तब चाचा ने सभी चूजों को लाल, पीले और गुलाबी रंगों से रंग दिया...वे देखने
में इतने सुंदर लगते मन करता कि उन्हें चुराकर अपने घर ले आएं..और उनका नाम
टूल्लू, मुल्लू रख दें।
मुझे तो बड़े ही अच्छे लगते हैं ऐसे जानवर जिन्हें हम सजा-संवारकर और भी सुंदर
बना देते हैं। जैसे वे हमारे ही भाई-बहन या घर के बच्चे हों।
सोमवार, 25 जनवरी 2016
26 जनवरीः लड्डू खाने का दिन!
हर साल 26 जनवरी और 15 अगस्त पर स्कूल के दिनों की याद आती है। गणतंत्र दिवस
के एक दिन पहले स्कूल में हॉफ डे कर दिया जाता था। छुट्टी के बाद हम लोग दौड़ते
हुए घर पहुंचते थे और अपना यूनिफॉर्म निकालकर साफ करते थे ताकि अगले दिन साफ-सुथरा
ड्रेस पहनकर 26 जनवरी मनाने स्कलू जाएं।
गणतंत्र दिवस के एक दिन पहले जब हम अपना यूनीफॉर्म साफ करते तो अगले दिन तक वह
सूख नहीं पाता था। जाड़े की कम धूप या कुहरा के चलते ऐसा होता था। हम रात में सोने
से पहले यूनीफार्म को उटल-पलट कर देखते की कितना सूखना बाकी है। स्कूल जाकर
गणतंत्र दिवस मनाने की इतनी खुशी होती मन में की हम 26 जनवरी की भोर में चार बजे
ही उठ जाते। यूनीफॉर्म तब भी नहीं सूखा होता था। उन दिनों मां हमारे बाकी कपड़े
जरूर धो देती लेकिन अपना यूनीफॉर्म हम खुद ही धोया करते थे। 26 जनवरी की सुबह स्कूल
जाने की तैयारी लेकिन तब तक यूनीफॉर्म सूखा ही नहीं रहता। हम हल्के गीले यूनीफार्म
पर ही आयरन चलाते..बार-बार चलाते और इस तरह उसे पहनने लायक बनाते।
बाकी स्कूलों को तो नहीं पता लेकिन यूपी बोर्ड के स्कूलों में गणतंत्र और
स्वतंत्रता दिवस मनाने के लिए फूल-मालाएं भी बच्चों से ही मंगाए जाते थे। हमें पता
होता था कि हमें फूल लेकर ही स्कूल जाना पड़ेगा। 25 जनवरी की शाम ही हम पड़ोस के
घरों से गेंदे का फूल तोड़कर रख लेते थे। कभी-कभी जब फूल ज्यादा इकट्ठे हो जाते तो
हम अपने नन्हीं उंगलियों में जाने कितनी बार सूइयां चुभोकर मालाएं गूथा करते थे।
उन दिनों स्कूल के बच्चों में इस बात का ज्यादा क्रेज रहता था कि 26 जनवरी पर
किसके स्कूल में क्या मिलता है। लड्डू तो सभी के स्कूल में बांटे जाते थे लेकिन
इसके अलावा भी किसी स्कूल में जलेबी तो कहीं आलू दम बच्चों को दोने में दिए जाते
थे। आलू दम में मिर्च इतना ज्यादा होता था कि बच्चे इसे खाने में अपनी आंख और नाक
के पानी बहा डालते और फिर जमकर पानी पीते।
जब इंटरमीडिएट में गई तो घर से 16 किमी दूर साइकल चलाकर स्कूल जाना पड़ता था।
जीआईसी में इंटरमीडिएट की कक्षाएं ग्यारह बजे से चला करती थीं। लेकिन कई विषयों की
कोचिंग पढ़ने हम घर से सुबह छह बजे ही निकला करते थे फिर स्कूल की क्लास करने के
बाद शाम पांच बजे घर लौटा करते थे। उन दिनों गणतंत्र और स्वतंत्रता दिवस किसी
छुट्टी से कम नहीं लगता। 16 किमी साइकल चलाकर सिर्फ गणतंत्र दिवस मनाने जाने स्कूल
जाने में हमें बहुत आलस आता था। हमारे दोस्त कहा करते कि अब हम बड़े हो गए हैं
सिर्फ लड्डू लेने स्कूल नहीं आएंगे। सबसे ज्यादा शर्म लड़कियों को आया करती थी..26
जनवरी पर स्कूल में लड़के उन्हें कहा करते देखो सिर्फ लड्डू लेने के लिए स्कूल आ
गई। और जवाब में लड़कियां उन्हें कहा करतीं अच्छा...तुम लोग क्या झंडे के नीचे शहीद
होने स्कूल आए हो। इंटरमीडिएट की कक्षाओं में छात्र-छात्राओं को 26 जनवरी पर
फूल-मालाएं लेकर स्कूल नहीं जाना पड़ता था।
शनिवार, 23 जनवरी 2016
कोई चांद देखने वाला हो!
चांद और मेरे बीच क्या रिश्ता है यह मुझे नहीं मालूम। लेकिन हां..चांद अब रिश्ते
में मेरा मामा नहीं लगता। अगर कोई चांद से हमारे रिश्ते के बारे में पूछे तो शायद
चांद का जवाब यह हो कि मैं उसकी फैन हूं। सबसे बड़ी वाली फैन।
आसमान में जब भी गोल-मटोल चमकीला चांद देखती हूं तो मेरा मन तितली की तरह हो
जाता है। पैर जमीन पर नहीं पड़ते लेकिन मैं किसी फूल पर नहीं बैठती। चांद देखकर
इतनी खुशी होती है कि मैं इसे अपने मन में नहीं समाना चाहती। अपना फोन उठाकर फटाफट
नंबर ढूंढने लगती हूं जिससे कह सकूं देखो न आसमान में कितना प्यारा चांद निकला है।
कभी-कभी यह बताते वक्त मुझे वैसे ही खुशी होती है जैसे मैं किसी से यह बता रही हूं
कि सुनो न! मेरे भाई को बेटी
हुई है..मैं बुआ बन गई। लेकिन खुशी तो खुशी होती है न! चाहे वह खूबसूरत चांद
देखने की ही क्यों न हो।
चांद आसमान में था और मैंने एक दोस्त को फोन किया। फोन उठाते ही उसने कहा कि
कितनी तेज ठंड पड़ रही है यार। मैंने कहा-लेकिन इसी ठंड में तुम्हे एक कष्ट करना
होगा। उसके बाद मैं खूब जोर-जोर से बोलने लगी... छत पर जाकर देखो न कितना प्यारा
चांद निकला है..बहुत सुंदर लग रहा है देखने में। यह कहते हुए मुझे ऐसा लग रहा था
जैसे मैं उससे कह रही हूं छत पर जाकर देखो न किसी की बारात जा रही है..और दुल्हे
को देखना कितना सुंदर दुल्हा है।
थोड़ी देर बाद चांद देखकर दोस्त ने कहा कि रोज कि तरह ही तो निकला है..मैंने सोचा
कि चांद मेकअप करके निकला है क्या जो तुम्हे इतना सुंदर दिखने लगा। बात का मजाक
बनाकर उसने फोन रख दिया।
मैंने दूसरे दोस्त को फोन किया और बोली-आसमान में देखो न चांद कितना सुंदर दिख
रहा है। वह बोला-कोई कविता लिख रही थी कि क्या? तुम तो शायरों की तरह बातें कर रही हो।
मैंने कहा- सच में सुंदर है देखो तो जाकर।
वह बोला- चांद तो मैं देख लूंगा लेकिन तुम्हारी नजर कहां से लाऊंगा?
इस तरह वह भी चांद नहीं देखा। और मैं दुखी होकर यह लेख लिखने बैठ गई।
जिस वक्त मैं यह लेख लिख रही हूं, मेरे कमरे का दरवाजा खुला हुआ है और चांद
मेरे कमरे में झांक रहा है...दरवाजे के ठीक सामने। मानो कह रहा हो मैं तुम्हारे
आंखों के सामने हूं..मुझे देखो और लिख डालो। इस वक्त मुझे ऐसा लग रहा है जैसे कोई
मेरे सामने बैठा हो और यह कह रहा हो मुझे देखकर बना दो मेरी खूबसूरत सी पेंटिंग।
चांद कॉलेज के दिनों से ही मेरा पीछा कर रहा है। जब मैं हॉस्टल में रहती थी उस
वक्त मेरे कमरे की खिड़की से चांद दिखता था। मेरी रूममेट रात में अपने ब्वॉयफ्रेंड
से फोन पर बातें करती और मैं खिड़की से चांद देखा करती। उस वक्त लैपटॉप पर आबिदा
परवीन की गजल ‘आंगन वाले नीम में
आकर अटका होगा चांद, हम तो हैं परदेस में देश में निकला होगा चांद’... ही बज रहा होता। उसके
बाद जितने भी किराए के घरों में रही कमरे से ही चांद आसानी से दिख जाता। चांद तो
दिख जाता लेकिन अब तक वह न मिला जिससे कहा जा सके..देखो न आसमान में चांद कितना
प्यारा दिख रहा है।
शुक्रवार, 8 जनवरी 2016
दो चूहों की मौत
अपनी जिंदगी में मैंने किसी भी इंसान को मरते हुए नहीं देखा, जब भी देखा मरने
के बाद ही देखा। ठीक ऐसे ही मैंने किसी जानवर को भी मरते हुए नहीं देखा बल्कि मरने
के बाद ही देखा। लेकिन मेरा ऐसा कोई अरमान कभी नहीं रहा कि मैं किसी को मरते हुए
देखूं।
जैसा कि चूहों से तंग आकर इनका बखान मैं पहले भी कर चुकी हूं सो इनके बारे में
ज्यादा कुछ कहने की जरूरत नहीं। चूहों से तो सभी परेशान रहते हैं लेकिन ऐसा लगता
है कि मुझे कोई विशेष श्राप मिला है जैसे राम को चौदह वर्ष का वनवास मिला था ठीक
वैसे ही मुझे भी दो सालों तक चूहों द्वारा प्रताड़ित किए जाने का श्राप किसी ने
दिया है शायद।
चूहे मारने की जितनी भी दवाइयां इस्तेमाल की मैंने चूहों की उम्र उतनी ही
बढ़ती गई। मैं हरदम लोगों से चूहे मारने का उपाय पूछती रहती जैसे कोई मरीज छत्तीस
डॉक्टरों के पास से अपने मर्ज का इलाज कराने में नाकाम होने पर किसी न किसी से
बड़े और अच्छे डॉक्टर का पता पूछता फिरता है। आधी रात को जब चूहे कभी मेरे पेट पर
कभी चादर से ढके मुंह के ऊपर गिरते तो मेरे प्राण सूख जाते थे। मैंने चूहों के
मरने की उम्मीद छोड़ दी थी। लेकिन मुझे यह यकीन जरूर था कि इनके दहशत से एक दिन
मैं जरूर मर जाऊंगी।
पिछले दिनों छुट्टियों में घर गई थी। तब मां ने चूहे मारने की एक दवा दी। उस
दवा को देखकर मेरी हंसी छूट गई। मां ने मुझे आश्चर्य से देखते हुए पूछा- हंस क्यों
रही हो। मैंने कहा मेरे कमरे में जो चूहे आते हैं तुम्हारे घर की चूहों की तरह
नहीं हैं। मालगोदाम के चूहे आते हैं मेरे कमरे में, एकदम खाते-पीते घर के, और साथ
में किसी ने उन्हें अमरत्व का वरदान भी दे रखा है। कोई भी दवा खिलाओ मरते ही नहीं,
सैलरी के कुछ पैसे तो इन्हें मारने की दवा खरीदने में ही खत्म हो जाते हैं। मां
बोली-इस दवा से तुम्हारे कमरे के चूहे जरूर मर जाएंगे। लेकिन मुझे यकीन नहीं हुआ।
घर से वापस लौटने पर मैंने बिस्किट के छोटे-छोटे टुकड़ों में नील पाउडर की तरह
दिखने वाली चूहे मारने की दवा लगाकर कमरे में जगह-जगह रख दिया औऱ कमरा बंद कर ऑफिस
चली गई। जब वहां से लौटी और कमरा खोली तो काफी निराश हो गई। बिस्किट के सभी टुकड़े
उसी तरह उसी जगह पर पड़े हुए थे। रात में एक बार मेरी नींद खुली तो मैंने लाइट
जलाकर देखा, बिस्किट के कुछ टुकड़े गायब थे। थोड़ी उम्मीद जगी कि शायद दवा काम कर
जाए।
सुबह उठने के बाद मैं अखबार पढ़ रही थी कि अचानक मेरी नजर एक चूहे पर पड़ी। वो
लड़खड़ाते हुए दीवार का किनारा पकड़कर चल रहा था। कभी लुढ़क कर गिर जाता कभी रूक
जाता। उसकी आंखें कभी खुलती तो कभी बंद हो जाती। उस वक्त वह चूहा मुझे ठीक वैसे ही
दिख रहा था जैसे कोई शराबी हाथ में दारू की बोतल लिए सड़क पर झूमते हुए और
लड़खड़ाते हुए चलता है। मैंने कमरे का मुआयना किया तो देखा कि दूसरा चूहा बेड के
नीचे मेरी चप्पल के पास लुढ़क रहा था जैसे देवदास पारो के घर की चौखट पर दारू पीकर
लुढ़का हो। देखते ही देखते कुछ ही मिनट में दोनों चूहों के प्राण-पखेरू उड़ गए। यह
देख मेरे आंखों से आंसू निकलने लगे (खुशी के नहीं गम के) और मैं अपने आप को सबसे बड़ी
पापी समझने लगी।
जमीन पर पड़े चूहों की लाश को मैं वैसे ही देख रही थी जैसे मैंने अपने दादा जी
के शव को देखा था। मुझे बहुत रोना आ रहा था लेकिन सांत्वना देने वाला कोई भी नहीं
था उस वक्त। मैंने दोनों चूहों को एक कागज पर उठाया। ठीक उसी वक्त मुझे अपनी दादी
की एक बात याद आयी। उन्होंने जाने क्या सोच के एक बार बोला था कि जब वो मर जाएं तो
उनकी फोटो खींच कर रख ली जाए। इन चूहों को भी याद करने के लिए मैंने उनकी फोटो
खींच कर रख ली। उस दिन के बाद से कमरे में काफी सन्नाटा है। कूदने-फुदकने वाले
दुनिया को अलविदा कह गए। जब भी कोई छूछूंदर मेरे कमरे में दिखती है मैं उससे ही
पूछ लेती हूं कि इतना सन्नाटा क्यों है भाई।
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