Sunday, 1 September 2013

एक गांव का चिंतित ग्राम प्रधान....


मुझे अच्छी तरह याद है तीन-चार साल पहले वे अख़बार के पन्ने में आंख गड़ाए कहा करते थे, लूट  थे, रिश्ते में हमारे भईया लगते थे और हमारे पडोस में उनका घर था।
 हमारे घर आकर घण्टों कुर्सी तोड़ते औऱ घर के सारे पढ़ने लिखने वाले बच्चों को ऊबाउ ज्ञान देते जिसे सुनना हम सबकी मजबूरी होती थी।
गांव के प्रधानी के चुनाव में में दो बार हाथ-पैर मारे थे औऱ शिकस्त खाकर गिरे भी थे, लेकिन ये हौसला कैसे रुके की तर्ज पर अगला चुनाव लड़ने की तैयारी पर थे। प्रधानी के चुनाव मे जिस आदमी से इनका मुकाबला होता था उसने पच्चीस सालों से प्रधानी की कमान किसी औऱ के हाथों में न आने दी थी। उसके पिताजी दो बार प्रधान रहे, माता जी एक बार, पत्नी जी एक बार औऱ वो खुद एक बार।
लेकिन उस साल किस्मत ने भईया जी का साथ दिया औऱ पच्चीस सालों से जीतते आए उश परिवार  औंधे मुंह गिराते हुए वो प्रधानी का चुनाव जीत गए ( जिनका कि अब प्रधानी का अंतिम साल चल रहा है)। प्रधानी का चुनाव जीतते ही जाति बिरादरी में या हो सकता है पूरे गांव में खुशी की लहर दौड़ गयी। एक ऐसी खुशी कि जिनमें गांव के सातवीं-आठवी के बच्चे भी बैड बाजा पर दारु पीकर बनियान फाड़ू नाच नाचे थे और बच्चों के पिताजी ने इस पर चूं तक न की थी।
जहां मनुष्यों में खुशी की लहर दौड़ गई थी वहीं जानवरों की शामत आ गई थी। खुशी के इस मौके पर बकरों की बलि दी गयी तो कुछ अन्य जानवरों का पूंछ औऱ कान काट कर काली मईया के नाम पर छोडा गया। नए प्रधान जी बैड बाजे के साथ गांव के एक एक घर में जाकर बड़ों का पैर छूकर अपने सिर पर हाथ रखवाया जिसके वीडियो रिकार्डिंग की सीडी कैसेट लोग एक दूसरे से मांग कर महिनों तक देखते रहे।
वोट मांगते वक्त गांव वालों से जो वादे किए गए थे, अब उसे निभाने की बारी थी। शुरुआत कुछ ऐसे हुई कि प्रधान ने प्रधानी के पैसे से सर्वप्रथम रामनगर में अपने लिए ज़मीन खरीदी। प्रधान के एक दो खास आदमी के अलावा इस बात की भनक गांव के किसी व्यक्ति को न लगी।
एक सुबह गली मे भीड़ लगी रही, पता चला प्रधान जी गली के खड़ंजे को उखडवाकर पक्की गलियां औऱ पानी के निकास के लिए भी कुछ आधुनिक ढंग से नालियां बनवाने जा रहे हैं ।गली में बिझे ईटों को उखाड़ दिया गया। गांव के लोग खुश थे कि सही प्रधान चुना है हमलोगों ने, बहुत जल्दी ही गांव के विकास का काम शुरु हो गया। गली बनाने के काम में लगे मजदूर निपिर-निपिर करते रहे, इस वजह से कि उनको समय पर मजदूरी नहीं मिलती। इसी बीच प्रधान ने नयी इनोवा खरीद ली।
गली बनाने का काम ऐसे चला कि बरसात का मौसम आ गया और आए दिन गली बरसात के पानी में डूब जती। अपनी प्रधानी के अब तक के काल में प्रधान ने सिर्फ गलियां बनवायी है वो भी लोगों की गालियां खा- खाकर। अब अपनी प्रधानी के अंतिम साल में प्रधान ने हाईस्कूल में पढ़ने वाली  अपनी लड़की को स्कूटी औऱ एक मोबाइल, सातवीं में पढ़ने वाले लड़के को एक पल्सर और एक मोबाइल तथा चौथी में पढ़ने वाले लड़के को एक रेंजर दिलवायी है।
घर में खेती के लिए ट्रैक्टर, बच्चों के लिए कंप्यूटर, बीबी के लिए वॅाशिंग मशीन, एल सीडी टेलिविजन, ठण्डे पानी के लिए फ्रिज इत्यादि व्यवस्था की है। प्रधान की इन सब सुख-सुविधाओं को देखते हुए कुछ साल पहले चिन्तित स्वर में उन्ही की कही बात याद आती है-देश में लूट मची है, लोगों को अपनी जेब भरने से फुर्सत नहीं है।
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