Wednesday, 22 March 2017

दुनियावालों...मैंने चोरी की है....



कल एक दूकान पर फोटो स्टेट कराने गई थी। जीरॉक्स के बाद दूकानवाले ने मुझसे सात रूपए मांगे तो मैंने उसे दस का नोट पकड़ा दिया। उसने नोट अपने हेल्पर को दिया और बाकी पैसे वापस लौटाने को बोला। हेल्पर ने मुझे सात रूपए वापस किए जब तीन रूपए ही वापस करने थे। मेरे हाथ में सामान ज्यादा था इसलिए मैंने जैसे-तैसे पैसे पकड़ तो लिया  लेकिन यह नहीं देखा कि कितना वापस किया उसने। अगली दूकान पर जब मैंने सारे सामान बैग में भरे और पैसे जब पर्स में रखने लगी तो मैंने देखा कि एक पांच और दो का सिक्का वापस किया था उसने। पहले तो मेरा मन किया कि उस दूकान पर जाकर उसके सात रुपए वापस कर दूं और बचे तीन रूपए ले लूं लेकिन जाने क्या दिमाग में आ रहा था कि मैं वहां जा न सकी।

उसके सात रूपए तो वापस करने मैं नहीं गई लेकिन पूरे रास्ते भर मुझे यह महसूस हो रहा था जैसे किसी का कोई बड़ा सामान चुराकर भाग रही हूं मैं। जैसे ही मैं चार कदम चलती मुझे एहसास होता कि जो मैं करके जा रही हूं ये भी तो चोरी ही है। ईमानदारी तो इसमें थी कि जब मैंने देखा कि उसने तीन की बजाय सात रुपए वापस किए हैं मुझे तो उसी वक्त उसके रुपए लौटा देने चाहिए थे मुझे लेकिन मैं ऐसा नहीं कर पायी।

रास्ते भर इस बात का पछतावा रहा कि मैं दूकानदार के पैसे लेकर घर जा रही हूं। घर पहुंचने पर इन सात रुपयों की वजह से मन जाने कैसा हो रहा था। ऐसे तो मैं खुद कहते फिरती थी कि ईमानदारी का तो जमाना ही नहीं रहा और आज मैंने कौन सी ईमानदारी दिखायी। मैं पछतावे से बाहर नहीं निकल पा रही थी। मैंने निश्चय किया है कि अब चाहे जितने दिन बाद भी उस तरफ जाना हुआ मैं दूकानदार के सात रुपए वापस करके अपने तीन रुपए ले आऊंगी अन्यथा अपनी खुद की ये चोरी मैं बर्दाश्त नहीं कर पाऊंगी।

...ताकि भरोसा बना रहे!



मैं अपनी एक सहेली को ऑटो पकड़ाने के लिए सड़क किनारे खड़ी थी तभी एक छोटे कद की महिला हाथ में साइकिल पकड़े सड़क पार करते हुए दिखी। मैंने अपनी सहेली से कहा-देखो वह महिला साइकिल चला रही है..कितनी बड़ी बात है। मेरी सहेली बोली-इसमें बड़ी बात क्या है। मैंने कहा-साड़ी पहनकर साइकिल चलाना बड़ी बात है और औरत का अपने काम से कहीं साइकिल चलाकर जाना भी बड़ी बात है। इस औरत को देखकर मुझमें ऊर्जा का संचार हो रहा है।

खैर, मेरी सहेली ने फिर कोई जवाब नहीं दिया और ऑटो पकड़कर वह चली गयी। जब मैं वापस लौटने लगी तो वह महिला साइकिल हाथ में पकड़े पैदल चल रही थी। मैंने उससे पूछा कि क्या उसकी साइकिल खराब हो गई है..वह पैदल क्यों चल रही है। मेरी बात का जवाब दिए बिना ही वह बोली- गरीबों पर किसी को तरस नहीं आता और मैंने तो तरस दिखाने वाला कोई काम भी नहीं किया था। मैंने मेहनत की थी..दो महीने उनके घर में खाना बनाया था..मेरा सिर्फ खाना बनाने और बर्तन मांजने का काम था उनके घर में लेकिन उनके घर में कोई और महिला नहीं है तो मैंने होली पर उनके घर का सारा अतिरिक्त काम करवाया...उनके चिप्स-पापड़ बनवाए मैंने पूरे घर की सफाई की। फिर अचानक ना जाने क्या हुआ और एक दिन उन्होंने फोन करके मुझे आने के लिए मना कर दिया और दूसरी खाना बनाने वाली को रख लिया। आज जब मैं दो महीने के काम का पैसा लेने पहुंची तो पंद्रह दिन का पैसा पकड़ा दिया उन्होंने और बोली तुमने बस पंद्रह दिन ही काम किया है।

क्या करूं दीदी..मैं तो मर जाऊंगी अगर मेरे तीन हजार रुपए नहीं दिए उन्होंने तो। मेरा मरद गांव में रहता है..मैं यहां किराए का कमरा लेके अकेले रहती हूं..पैसा नहीं मिला तो खरचा कैसे चलेगा। मालकिन बोलती है कि दुबारा यहां दिखी तो पुलिस में शिकायत कर दूंगी। बताओ दीदी मैंने तो बस अपना पैसा मांगा था, अब मैं क्या करूं..किसको लेकर जाऊं उनके यहां कि मेरा पैसा मिल जाए..मैं यहां किसी को जानती ही नहीं। वह लगातार अपनी बात बोले जा रही थी...मेरे पास कोई शब्द नहीं था कहने को। बस इतना ही कह पायी मैं कि –बहुत गलत किया आपकी मालकिन ने।

अपनी जिस सहेली को थोड़ी देर पहले ऑटो पर बैठाया था मैंने मैं उससे यह शिकायत कर रही थी कि दो महीने हो जाते हैं और तुम मिलती नहीं हो। वह बोली क्या करें यार, मम्मी से ऑटो का किराया मांगना पड़ता है उनके पास पैसे नहीं रहते तो नहीं दे पाती हैं इसलिए मैं आ नहीं पाती। जब मैंने उससे पूछा कि उसकी मम्मी क्या करती हैं और क्या घर की हालत ठीक नहीं है तो वह बोली कि उसके पापा की डेथ हो चुकी है और घर चलाने के लिए उसकी मम्मी एक घर में खाना बनाती हैं। लेकिन वह उन लोगों की तारीफ भी कर रही थी जिनके घर में उसकी मम्मी खाना बनाती हैं। वह बता रही थी कि वो डॉक्टर अंकल औऱ आंटी बहुत अच्छे हैं। समय से मम्मी को पैसे भी दे देते हैं और कभी मम्मी को उधार की जरूरत पड़ती है तो बिना कुछ पूछे ही पैसे दे देती हैं और कपड़े तथा खाने-पीने की चीजें भी देती रहती हैं। हम लोग गरीब जरूर हैं लेकिन वे दोनों लोग इतने अच्छे इंसान हैं कि उन्हें अपना सहारा भी समझते हैं। एक विश्वास भी है, दुख-तकलीफ भी समझते हैं वे लोग और उम्मीद से कहीं बढ़कर कर देते हैं हम लोगों के लिए।

उसकी बात याद करके मैंने मन ही मन सोचा कि काश इस औरत की मालकिन कम से कम इतनी इंसानियत रखतीं कि उसे उसके मेहनत का हिसाब दे देतीं तो उस महिला का इंसानियत से भरोसा नहीं उठता।

Tuesday, 21 March 2017

ऐसी हैं मेरी दादी...



कुछ साल पहले मेरी एक भैंस को जाने कौन सा बीमारी हो गई थी। दिन भर वह बेचारी मुंह से गोबर की उल्टी करती और बेचैन रहती। उसके दोनों आंखों से खूब आंसू भी निकलते। जितने दिन भैंस ने गोबर की उल्टी की उसकी चिंता में मेरी दादी की हालत खराब होने लगी। एक दिन रात में दूरदर्शन पर घर के सभी लोग फिल्म देख रहे थे तभी दादी के जोर-जोर से रोने की आवाज आयी। दादी घर के बरामदे में जमीन पर बैठी दहाड़े मारकर रो रही थीं। उनके ठीक बगल में भैंस गिरकर मर गई थी। उसकी जीभ बाहर निकल गई थी। मेरी दादी अपने सिर के बाल नोंच नोंचकर पागलों की तरह रो रही थीं और लगातार यह कह रही थीं कि तुम लोगों के दादा जब इसे खरीद कर लाए थे तब 15 दिन का बच्चा था ये। इतना गोरा-चिट्ठा(ज्यादातर भैंस काली होती हैं लेकिन मेरी वो भैंस भूरी या गोरी थी) थी। ठीक से खड़ी भी नहीं हो पाती थी..इसकी मां मर गयी थी तो मैंने इसे गिलास से दूध पिलाकर पाला। दादी के आंसू नहीं रूक रहे थे उस भैंस से उनको बहुत प्यार था।

दादी को घर के सभी भैंसों से उतनी ही ममता है अब। कुछ दिन पहले मैं घर गयी थी तो देखा कि भैंस के गले में मोटी रस्सी डालते-डालते उसकी गर्दन पर घाव के निशान आ गए थे। भैंस घर के बाहर बंधी थी और कौवे आकर उसके घाव को इतना कुरेद दिए कि वहां से बहुत तेजी से खून निकलने लगा। घर के बाकी लोगों ने भी यह देखा लेकिन सभी भैंस को दवा लगाने के नाम पर टाल-मटोल कर गए। लेकिन दादी ऐसे तिलमिला उठीं जैसे वह उन्हीं का घाव हो। उन्होंने भैंस के घाव पर मरहम लगाकर चौड़ी पट्टी बांध दी और भाभी की दो साल की बेटी को यह देखने के लिए लगा दीं कि जब भैंस के ऊपर कौवा बैठे तो वह तुरंत डंडा दिखाकर उसे उड़ाए या उन्हें फौरन बुलाए। मेरे पड़ोस के लोग जब भैंस दूध देना बंद कर देती है तो उसे बेचकर नई भैंस ले आते हैं लेकिन मेरी दादी मेरे घर की भैंस जब दूध देना बंद कर देती है तो उसे बेचने नहीं देतीं और नए बच्चे के इंतजार में उसकी सेवा करती हैं। ऐसी हैं मेरी दादी..पशुओं से बहुत लगाव है उन्हें।

Tuesday, 21 February 2017

25 साल की लड़की भला ऐसे रहती है!



सुबह छह बजे उठती है। एक गिलास पानी गर्म करती है फिर उसमें नींबू निचोड़कर गटक जाती है। जूते का लेस बांधने नहीं आता फिर भी जूता चढ़ा लेती है पैरों में और चार किमी का रास्ता नापने निकल जाती है। जब वापस आती है तो टी-शर्ट पसीने से भीगा होता है और वो खुद भी। कान में इयरफोन लगाकर आधे घंटे तक राग भैरवी और राग जौनपुरी सुनती है। इसके बाद चिंतन में लीन हो जाती है। वहां से उठती है तो फिर नहाती-धोती है लेकिन पूजा-पाठ बिल्कुल नहीं करती। चना गुड़ खाती है या फिर सत्तू घोलकर पीती है। चाय के नाम पर बुखार आ जाता है उसे। इसके बाद अपने काम में लग जाती है। किसी से ज्यादा मतलब नहीं रखती ना ही ज्यादा बोलती है।

दोपहर में दो रोटी, एक कटोरी बिना तड़के वाली दाल, एक कटोरी मिक्स्ड सलाद खाती है। दो रोटी मतलब दो रोटी...ना कम ना बेसी। सब्जी कम तेल और मसाले वाली। दाल में घी से भी कोई दुश्मनी है। सादा मतलब एकदम सादा खाना जो अस्पलात में भर्ती मरीज खाता है..वही वाला।
खाने के बाद एक घंटे तक चादर तानके सोएगी। जब उठती है तो एक एक लीटर पानी सोख जाती है। फिर अपने काम में लग जाती है। शाम को छत पर टहलेगी और अपने पसंद के कुछ गाने भी सुन लेती है। बाजार के सारे कामों की लिस्ट बनाकर रखती है और रोज की बजाय सिर्फ रविवार को इन कामों को निपटाने के लिए बाजार जाती है। हफ्ते भर के गंदे कपड़े किसी एक दिन रात में धोती है।

रात को अपना सारा काम खत्म करने के बाद मिक्स्ड सब्जी वाली दलिया खाती है। कम्प्यूटर, लैपटॉप से रात में दूर ही रहती है। इसके बाद कान में फिर से इयरफोन ठूंसती है और राग मल्हार सुनते-सुनते सो जाती है।
अगले सुबह की फिर वही राम कहानी। बताओ भला पच्चीस साल की कोई लड़की भला ऐसा करती है..ऐसे रहती है..ऐसे जीती है..ऐसे खुश रहती है? ऐसे जीने खाने में तो पचास साल वाले भी बोर हो जाएं। भगवान भला करें इस लड़की का!

जब अंडे खायी और खूब रोयी..

थर्ड फ्लोर की उस लड़की के साथ रोज शाम सब्जी खरीदने जाती थी मैं। हॉस्टल वापस लौटते समय वह रोजाना दो कच्चे अंडे खरीदती थी। फिर मैं अपनी सब्जी का थैला उसे छूने नहीं देती थी। मैं रास्ते में उससे पूछा करती कि अंडे को हथेली पर रखने पर कैसा महसूस होता है? क्या गिरने पर तुरंत टूट जाता है? खाने में कैसा लगता है? खाने के बाद क्या मुंह भी महकता होगा? वह मेरी इन बचकानी बातों से झुंझला जाती और बोलती कच्चा अंडा अगर गिरेगा तो टूटेगा ही। खाने में आलू जैसा लगता है या उससे भी कहीं ज्यादा टेस्टी। और मुंह क्यों महकेगा भला। मैं कहती मुझे क्या मालूम! जब अंडे का ऑमलेट बनता है तो तेज गंध आती है तो मुझे लगा कि खाने के बाद मुंह भी महकता होगा। फिर वह नाराज होते हुए कहती- मुझसे कुछ मत पूछा करो, किसी दिन खुद खाकर देख लो कैसा लगता है।

मेरे परिवार का कोई भी सदस्य अंडा नहीं खाता। पूरा परिवार शुद्ध शाकाहारी है। जाहिर है मैं भी कुछ दिन पहले तक शुद्ध शाकाहारी थी। मेरे पड़ोस में एक छोटा बच्चा रोज शाम को उबला हुआ अंडा नमक लगाकर खाता था। मैं उसे यूं देखती थी जैसे वह कोई कठिन काम कर रहा हो जो मेरे बस का न हो। जब वह अंडे में नमक लगाता तो मैं उससे पूछती अंडा खाने में कैसा लगता है? वह मुझे अजीब सा मुंह बनाकर देखता और मुझसे पूछता तुम गरीब हो? जब मैं कहती नहीं तो..वह कहता रोज शाम को बंशी ठेले वाला बेचता तो है अंडा..खुद खाकर देख लो कैसा लगता है। 

थर्ड फ्लोर की वह लड़की उस दिन दस कच्चे अंडे पैक करायी। यह देखना बहुत अच्छा लगा। वापस आते वक्त उसके एक हाथ में सब्जी का थैला और दूसरे हाथ में दस अंडे का लटका पैकेट देखकर ऐसा लग रहा था जैसे वह किसी ऑफिस में काम करती हो, बैचलर हो (वो तो है ही वह) और रोज ऑफिस से लौटते हुए अंडे पैक कराती हो और घर जाकर फ्रिज में सारे अंडे भर देती हो। उसके हाथ में अंडे देखकर यह सब सोचना सुखद लगता था।

एक रात मुझे सपना आया कि मेरा अंडा खाने का मन कर रहा है लेकिन कोई खाने नहीं दे रहा है। अगले दिन मैंने थर्ड फ्लोर की उस लड़की को सपने के बारे में बताया। वह बोली-जब खाने का मन कर रहा है तो खा लो। इच्छा को मत दबाओ। शाम को वह मुझे अंडे की एक दुकान पर लेकर गई। वहां पहुंचते ही मेरा मन इतना घबराने लगा कि मैंने उससे कहा-नहीं खाना मुझे अंडा-वंडा..चलो यहां से।

मैं वापस तो आ गई लेकिन फिर भी इच्छा बनी रही। अगले दिन सारा काम छोड़कर मैं खुद को मनाने में लगी रही कि मैं आज जरूर अंडा खाऊंगी और घर पर किसी को नहीं बताऊंगी। अगर अंडा खाना बुरी बात है तो मैं यह बुरा काम करूंगी। 

शाम को उस लड़की के साथ मैं अंडे की दूकान पर गई। एक उबले अंडे पर नमक प्याज छिड़क कर दिया ठेले वाले ने। सिर्फ एक छोटा टुकड़ा काटकर खायी ही थी कि उबकाई आने लगी। मेरे हाथ ठंडे पड़ने लगे। बाकी जो बचा था वह लड़की खा गई।

हॉस्टल वापस आने के बाद जाने कैसा मन होने लगा। खूब जोर-जोर से रोने का मन कर रहा था। ऐसा लग रहा था मैंने किसी का सामान चुरा लिया हो, किसी को पत्थर मार के सिर फोड़ दिया हो औऱ भी जाने कैसा-कैसा सा। किसी अपराध बोध सा मन भरा था। मैं बिल्कुल शांत पड़ गई थी। किसी से कुछ बात नहीं कर पा रही थी। गम कुछ इस कदर था कि रात का खाना भी नहीं खायी और ना ही पूरी रात सो पायी। रात को लेटे-लेटे जब नींद नहीं आय़ी तो छत पर जाकर एक कोने में बैठकर रोने लगी। हाय रे मैंने क्या कर दिया...मैं अंडा खा ली—मेरी मम्मी को पता चलेगा तो गला दबा देंगी मेरा..अब मैं शाकाहारी नहीं थी.. अफसोस में सारी रात निकल गई।