Friday, 17 February 2017

जब नए कपड़े पहनती हूं तो लाज लगती है...



सच में, उस दिन बहुत शर्म आती है जब नए कपड़े पहनकर घर से बाहर निकलती हूं। खासतौर पर जब ऑफिस या क्लास जाना हो तो नए कपड़ों में वैसे ही शर्म आती है जैसे नई-नई शादी के बाद लड़की को अपने मायके में सिंदूर और बिंदी लगाने और होठ रंगने में।

अपनी यह खूबी जानकर मैं साइज से थोड़े बड़े कपड़े खरीदती हूं ताकि तीन-चार महीने बाद जब मैं शर्माते-शर्माते पहनना शुरू करूंगी तब तक छोटा औऱ थोड़ा पुराना दिखने लगेगा। लेकिन चार महीने बाद जब उसे पहनने का मन बनाती हूं तो वह कपड़ा फिर अच्छा नहीं लगता। और अगर अच्छा लगे तो भी पहन कर उतार देती हूं और उसे ऐसे सिकोड़ कर रखती हूं ताकि पहनने के बाद पुराना सा दिखे। बाहर निकलने पर अगर कोई पूछे-अरे क्या बात है..आज नए कपड़े- तो इस बात की सफाई देते बने कि नए कहां हैं पुराना ही तो है..आप शायद इसे पहली बार देख रहे हैं।

कुछ जगहों पर तो जान-पहचान के लोग नए कपड़े पहने देख न्यू पिंच बोलकर जोर की चिकोटी काट लेते हैं। उनकी चिकोटी तो कभी-कभी ऐसा दर्द दे जाती है जैसा चींटी काटने पर भी नहीं होता है। और अपन को दांत चियार कर कहना पड़ता है..हां यार कपड़े नए ही हैं लेकिन चाची ने दिए हैं।

अगर हफ्ते में तीन दिन तीन अलग-अलग नए कपड़े पहन कर चले जाओ तो ऑफिस के वैसे लोग जो आपसे कम मतलब रखते हैं पहले तो  सबकी नजरों से बचके आपको स्कैन करेंगे फिर अपने बगल वाले को इशारे से आपको निहारने को कहेंगे फिर वे आपकी सैलरी-पत्री निकालते हैं- कितना कमाती होगी..अच्छा घर में भी तो नहीं देना पड़ता होगा..सिंगल है..खर्चे ही कितने हैं। एक नया कपड़ा क्या पहन लिया कि पांच मिनट के लिए दूसरों के लिए मुद्दा ही बनना पड़ता है।  क्लास में नए कपड़े देखकर सब फुसफसाएंगे-पापा क्या करते हैं इसके? मानों जिसके पापा कुछ नहीं करते वो नंगा ही घूमता है।

ऑफिस के दूसरे कोने में तीन लोगों का जो एक गुट बैठता है वो कैसे पीछे रह सकता है हिसाब लगाने में। पक्का बुध बाजार से खरीदती होगी। कपड़े देखो, देखकर नहीं लगता..अरे हर हफ्ते तो लगता है मार्केट...चार सौ रूपए में पांच टीशर्ट्स खरीदकर लाती है और ऑफिस में आकर भौकाल बनाती है।

खैर, शर्म आने की बचपन से ही कोई वजह रही है जो अब तक नहीं समझ में आयी। किसी को गाली देने में उसकी इज्जत उतारने में उतनी शर्म नहीं आती। नए कपड़ों से शर्म का कनेक्शन मेरे समझ के बाहर है लेकिन आती है तो झेलती भी हूं।

हफ्तों पहले से ही यह डिसाइड करने लगती हूं कि इस नए टीशर्ट को बुधवार को पहनूंगी, इस नई कुर्ती को शुक्रवार को पहनूंगी। शुक्रवार और बुधवार जब आता है तो मैं शर्म से इतनी गड़ जाती हूं कि नए कपड़े को रिन डिटर्जेंट से दो बार रगड़ कर धो देती हैं। कपड़ों का रंग पानी में बहता देख आंखों को बहुत सुकून मिलता है। बिना किसी बड़ी मशक्कत के नए कपड़े पुराने करने का यही आसान तरीका सूझता है। 
 
जब मैं काफी दिमाग लगाकर खुद से यह उत्तर पाने की कोशिश करती हूं कि आखिर नए कपड़ों को पुराने करने की जुर्रत मैं क्यों करती हूं तो एक ही जवाब मिलता है –ताकि मैं चिकोटी काटने वालों या-अच्छा जी आज नए कपड़े क्या बात है-कहकर बगल से गुजर जाने वालों को पेट दर्द जैसा अपना चेहरा बनाकर कह सकूं-नए कहां हैं, पुराने ही तो हैं। जाने क्यों बड़ी लाज आती है जी नए कपड़ो में।

Thursday, 16 February 2017

आखिर कब लिखेगी राजनीति पर वह?



पांचवी क्लास के किसी ऐसे बच्चे के बारे में सुना है आपने जिसे ए, बी, सी, डी लिखना आता हो लेकिन क, ख, ग, घ लिखने नहीं आता हे। एक से सौ तक गिनती लिख लेता हो लेकिन पढ़ नहीं पाता हो। दरअसल हम पांचवीं क्लास के बच्चे के बारे में इतनी छोटी बात नहीं सोच सकते यह समस्या तो यूकेजी या कक्षा एक के बच्चे को हो सकती है। पांचवीं क्लास के बच्चे की तो कोई और समस्या होगी। या तो वह पढ़ने में अच्छा होगा या पढ़ने में बुरा। किसी विषय में फेल हो जाता होगा तो किसी में पास। 

लेकिन इस लड़की की समस्या ऐसी है जो कक्षा पांच के भी बच्चे को होती है और यूकेजी के बच्चे को भी। पत्रकारिता में एमए करने के बाद भी उसे हर मुद्दे पर लिखना नहीं आता। कहानी लिख लेती है तो कविता उससे एकदम नहीं बन पाती। कविता उसकी कलम से जितनी ही दूर है वह कविता पढ़ने की उतनी है शौकीन है। फीचर लिख लेती है, लेकिन राजनीति पर नहीं लिख पाती। राजनीति पर न लिख पाना उसे किसी अभिशाप सा लगता है। हत्या, डकैती, छिनैती, दुर्घटना, मौत सब पर लिख लेती है, खबर बना लेती है लेकिन राजनीति पर नहीं लिख पाती। मुद्दे पता होते हैं लेकिन शुरूआत नहीं पता होती। दूसरों का लिखा जब संपादकीय पृष्ठ पर पढ़ती है तो उसे यह बेहद आसान लगता है। जैसे अभी शुरू करेगी तो इनसे बेहतर लिख लेगी। लेकिन शुरू नहीं कर पाती। कलम रूक जाती है। कुछ है जो दिमाग में रूक जाता है। कुछ है जो कलम चलने नहीं देता। राजनीति पर न लिख पाना उसे सोने नहीं देता, वह नींद में भी अपनी इस कमजोरी पर डर जाती है और किसी बुरे स्वप्न सा उसकी नींद खुल जाती है। आखिर कब लिखेगी राजनीति पर वह?

Thursday, 9 February 2017

I Hate You फरवरी!



सुनो फरवरी,

मैं तुम्हें पिछले छह साल से बिल्कुल पसंद नहीं करती। महीने के अंत से दो दिन पहले ही तुम मार्च को बुलाकर दफा हो जाती हो। अरे तुम कितना दुख दे जाती हो अपन को कुछ अंदाजा है तुम्हें। वैसे तो तुम बाकी महीनों से एक-दो दिन ही कम होती हो लेकिन इस महीने कमरे का किराया भरना बड़ा खलता है यार। किराया तो हमें 31 दिन का ही देना पड़ता है न। किसी भारी घाटे सा दुख महसूस होता है यार। तुम अन्य महीनों की तरह क्यों नहीं होती 30 या 31 दिन की?

वैसे तो अपन कभी इस तरह से हिसाब नहीं लगाते कि एक महीने का किराया इतना हुआ तो एक दिन का कितना होगा। लेकिन फरवरी तुम्हारी वजह से हम यह भी हिसाब लगाने लगे। तुम्हें पता ही होगा कि हमारे फाइनेंस मिनिस्टर एक महीने में पैसे भेजकर दो महीने तक मुंह उठाकर पैसे मांगने के लिए मना करते हैं। इसी में हमें गुजारा करना होता है यार। चाट-फुल्टी जैसी चीजों से भी हमारी जीभ ने वैराग्य ले लिया है। अगर हम फिजूल का खर्च कर दें तो टेंशन में आ जाते हैं। अगर कम खर्च करके बचा भी लेते हैं तो वो महीने के अंतिम दिन ना जाने कौन से कारण से खर्च हो ही जाता है यार। फरवरी I Hope कि तुम इस दो दिन का मतलब समझोगी। 

तुम नहीं जानती तो जान तो कि हम विद्यार्थी लोग पैसा वसूल चीजों के इस्तेमाल में विश्वास रखते हैं। सबसे सस्ती सब्जी खाते हैं और कोई दूसरी सब्जी सस्ती नहीं हुई तो पूरे महीने एक ही तरह की सब्जी से गुजारा चलाते हैं। पैसे बचाने की पुरजोर कोशिश करते हैं और चड्ढी में 12 छेद हो जाने के बावजूद भी उसे तब तक पहनते हैं जब तक उसके चिथड़े न हो जाएं। तुम ये जो दो दिनों का नुकसान करवाती हो न इसके बदले मकानमालिक हमें टॉफी देकर तो अपने घर से वापस भेजता नहीं बल्कि हम दुखी होकर खुद ये हिसाब लगाते हैं कि अगर दो दिनों का किराया बचा होता तो पनीर बनाकर खा लेते। कोई फल खरीद लेते जो कि ज्यादातर बजट से बाहर ही होता है अपन के। 

फरवरी तुम बहुत जुल्मी भी हो शुरू हुई नहीं कि फर्र से उड़ भी जाती हो और अगले महीने के किराए का टेंशन दे जाती हो। और मैं क्या कहूं तुम्हें, बस यही सब कारण हैं कि मैं तुम्हें पसंद नहीं करती। उम्मीद है तुम मेरी बातों का बुरा नहीं मानोगी। लेकिन जो भी हो I Hate You फरवरी.

Tuesday, 7 February 2017

जब Vipassana के लिए घरवालों को मनाना पड़ा...भाग-1



उस दिन जब घर में बतायी कि मुझे विपश्यना करने जाना है तो घरवालों को समझ में नहीं आया कि मैं क्या बोल रही हूं। कहां और क्या करने जाने की बात कर रही हूं। मैंने उन्हें समझाया कि सारनाथ में विपश्यना मेडिटेशन केंद्र है। वहां भगवान बुद्ध की साधना सीखायी जाती है। थोड़ी कठिन जरूर है लेकिन जीवन में बहुत लाभ होता है इसका। 

घर में इससे पहले कभी किसी ने मेडिटेशन नहीं किया था सो वे जानते भी नहीं थे कि मेडिटेशन क्या होता है। वे मेडिटेशन का सिर्फ हिन्दी अर्थ ही जानते थे। 

एक दिन बाद किसी से थोड़ी जानकारी इकट्ठा करने के बाद मम्मी गुस्से में आकर मुझसे बोलीं कि तुम्हें ऐसा क्या हुआ है कि मेडिटेशन करने की जरूरत पड़ आयी। कहीं बौद्ध धर्म स्वीकर करने की तो नहीं सोच रही हो। अभी तुम्हारी शादी भी नहीं हुई है कहीं सन्यासिनी बनकर सारनाथ किसी आश्रम में रहने की तो नहीं सोच रही हो।

मम्मी कि इन बातों को सुनकर मैं अपना सिर पीटने लगी। जब उन्हें मेडिटेशन के बारे में कुछ नहीं पता था तब उन्हें समझाने की गुंजाइश बची थी लेकिन अब तो ना जाने किसने उन्हें भड़का दिया था कि उसे कोई रोग तो नहीं है कि मेडिटेशन करने जाना चाहती है। कहीं बौद्ध धर्म स्वीकार करके वहीं न रह जाए, घर लौटे ही न।

मैंने हिम्मत नहीं हारी और बहुत शांत होकर घरवालों को समझाने की कोशिश की। वहां सिर्फ मेडिटेशन सीखाया जाता है और मेडिटेशन करने  की कोई उम्र निर्धारित नहीं है। लोग खुद पर नियंत्रण के लिए, शांति के लिए और दुनिया भर की चिंताओं से छुटकारा के लिए मेडिटेशन करते हैं। यह सिर्फ दस दिनों का कोर्स है। उसके बाद लगातार अभ्यास से ही जीवन में इसका फायदा दिखता है।

दस दिन....मम्मी बोलीं-मतलब तुम दस दिन के लिए ऐसी जगह पर जाओगी जिसके बारे में हमलोग जानते ही नहीं। अकेली लड़की को किसी अनजान जगह पर कोई कैसे छोड़ देगा। किसने तुम्हें भड़का दिया कि इसी उम्र में तुम्हें मेडिटेशन करना चाहिए। मैंने मम्मी को फिर समझाया कि मेडिटेशन करने की कोई उम्र नहीं होती। यह अपने लिए किया जाता है। आप भी मेरे साथ चलिए इससे आप भी दस दिनों तक साथ रह लेंगी और सीख भी लेंगी। मम्मी नाराज होते हुए बोली कि मैं स्वस्थ हूं और मैं कहीं नहीं जाऊंगी।

इसके बाद मैंने उन्हें हिम्मत करके बताया कि विपश्यना जाने के बाद मेरा फोन भी जमा हो जाएगा। दस दिनों तक मैं किसी से बात नहीं कर पाऊंगी। यह सुनकर घरवालों की चिंता जायज थी। मैंने केंद्र पर फोन करके घरवालों से बात करायी। उन लोगों ने बताया कि यहां हर किसी से सुरक्षा की पूरी व्यवस्था है। खाना-पीना सब कुछ निःशुल्क है। केंद्र के नंबर पर फोन करके कैंडिडेट का नाम बताकर उसका हाल चाल जाना जा सकता है। उन लोगों की बातों से घर वालों को थोड़ी तसल्ली मिली और मेरा विपश्यना के लिए जाने का रास्ता साफ हो गया।

Sunday, 5 February 2017

अपनी कौन सी आदत बुरी लगती है आपको?



कल बातों ही बातों में मैंने अपनी सहेली से पूछा कि उसके अंदर कौन सी बुरी आदतें हैं। वह बोली कि उसके अंदर कोई बुरी आदत नहीं है। ना ही वह चोरी करती है..ना तो किसी को गाली देती है और ना ही किसी का बुरा चाहती है। थोड़ी देर चुप रहने के बाद वह बोली कि हां उसके अंदर कुछ बुरी आदतें हैं जिन्हें वह शीघ्र दूर करना चाहती है। जब वह किसी दिन छह घंटे से ज्यादा सो लेती है तो घरवाले उसे ज्यादा सोने की गंदी आदत कहकर ताने देते हैं। जब वह घूमना चाहती है और अपना पसंदीदा म्यूजिक प्ले करके नाचना चाहती है तो उसे बिगड़ैल लड़की बोलते हैं। मेरी सहेली को भी लगता है कि ये उसकी बुरी आदतें हैं जिससे सभी नाराज हो जाते हैं, औऱ उसे अपनी इस आदत को जल्द छोड़ देना चाहिए। 

आज के समय में हम यह ठीक से तय ही नहीं कर पाते कि हमारे अंदर क्या अच्छी और क्या बुरी आदते हैं। मेरी सहेली घूमना, म्यूजिक सुनना और जी भर के सोना अपनी बुरी आदतों में मानती है क्योंकि उसके घरवालों को यह पसंद नहीं है। क्या सच में यह बुरी आदत है जो वह खुद को खुश रखने के लिए करती है।

इसके बाद मैंने खुद का आकलन किया कि मेरे अंदर बुरी आदतें क्या हैं। उफ्फ...भरमार है मेरे अंदर बुरी आदतों की। लेकिन मैं यह ठीक से तय कर पा रही हूं कि मेरे अंदर कि बुरी आदतें वाकई में बहुत बुरी हैं। जिसका खराब असर मुझ पर उसी वक्त पड़ता है जब मैं इसे करती हूं।

दिन हो या रात जब मैं बेड पर लेटी हुई सोने या आराम के मूड में होती हूं तब सच में मैं आराम के मूड में नहीं होती। लेटकर मोबाइल पर इंटरनेट चलाना, खास दोस्तों से चैट करना, उनकी शायरी पर वाह करना, यू ट्यूब पर वीडियो देखना दुनिया के तमाम सुखद कामों में से एक है। सोने से पहले मैं सिर्फ यह सोचकर इंटरनेट चलाती हूं कि दस मिनट के बाद बंद कर दूंगी और सो जाऊंगी। लेकिन यह न्यू ईयर रिज्योलूशन की तरह होता है अपना यह प्रण अगले ही पल टूट जाता है औऱ जब मोबाइल की घड़ी पर निगाह जाती है तो रात के एक या दो बज गए होते हैं, मतलब मैं एक से दो घंटे इंटरनेट पर जाने क्या करती रही। फिर नींद इस कदर भागती है कि करवट बदलते हुए रात बीतती है। नींद आती भी है तो इस तरह कि सोए होने के बाद भी सब पता चल रहा होता है कि कहां से कौन सी आवाज आ रही है। सुबह उठने पर सिर इतना भारी रहता है कि अपने आप को कोसने के अलावा कोई और ऑप्शन नहीं रहता।

मेरी बुरी आदतों में से एक आदत यह भी है कि मैं लोगों से बहुत जल्दी अटैच हो जाती हूं। उनसे उम्मीदें रखती हूं। उनसे अपनी हर तरह की समस्याएं शेयर कर देती हूं। उनसे बातें करती हूं। लोगों की आदी हो जाती हूं। यह जानते हुए भी कि लोगों का रूख हवा की तरह बदलता है। वे मेरी शेयर की गई बात को अपने खाली टाइम में दूसरों से बढ़ाचढ़ा कर बताते हैं और चटकारे लेते हैं। मुझे अपने फेसबुक मित्रों से भी कोई उम्मीद नहीं रहती लेकिन फिर भी कोई न कोई उम्मीद रहती है कि ये मुझे कभी ब्लॉक या अनफ्रेंड नहीं करेगा। लेकिन जब जान पहचान का फेसबुक मित्र बिना किसी वजह के अनफ्रेंड कर देता है तो फिर वह किसी सदमें से कम नहीं होता।

मेरे अंदर या फिर हम सभी के अंदर ऐसी ना जाने कितनी बुरी आदतें होती हैं जिससे हम सिर्फ अपना खुद का नुकसान करते हैं और यह ठान कर नुकसान करते हैं कि हां देखो हम अपना नुकसान कर रहे हैं। इस तरह की आदतें बहुत बुरी होती हैं गाली देने से ज्यादा, चोरी करने से ज्यादा और किसी से जलन का भाव रखने से कहीं ज्यादा। क्यों कि जब खुद से प्यार होगा तभी बाकी सब भी होगा। अपने आप से महत्वपूर्ण भी भला कुछ होता है दुनिया में।