मंगलवार, 1 अप्रैल 2014

इनके लिए एक ही इच्छा रहती है!!!



एक संयुक्त परिवार में अपने भाईयों में सबसे छोटे व्यक्ति ने कल जमीन खरीदी। वह खाली जमीन उनके घर के ठीक बगल में थी और बेचनेवाले से वह सिर्फ इसलिए खरीदना चाहते थे कि उनके घर से सटी वह जमीन उस घर का एक हिस्सा बन जाएगी। उनके घर में अब तक जमीन खरीदने का काम उनके बड़े भाई किया करते थे जब तक कि उन्हें उम्मीद थी कि एक ना एक दिन उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति होगी, हालांकि उनकी दो बेटियां हैं। व्यक्ति ने अपने भाई कि मनःस्थिति को देखकर कुछ भी पूछना उचित नही समझा और जमीन हाथ से निकलती. इससे पहले खुद ही खरीद ली।

 समाज में आजकल कुछ ऐसे लोग भी हैं जो घर में बेटा न होने का कोई गम नहीं करते, बेटियों को मानते हैं, अच्छी शिक्षा देते हैं। लेकिन अगर घर में बेटा होता तो शायद वह प्यार दुलार या सिर्फ अच्छी शिक्षा तक ही सीमित ना होता। एक समय आता है जब बेटा बड़ा भी नहीं हुआ होता है और मां-बाप को अपना घर बित्ते भर का लगने लगता है। और बेटे के नाम फ्लैट खरीदने की जुगत होने लगती है। माता-पिता जीवन भर बेटे के लिए पर्याप्त जमीन एवं सुविधाएं खरीदने में परेशान रहते हैं, और जितना खरीदते हैं वो सब उन्हें उतना ही कम लगता है। इस चक्कर में वे बेटे की कई पीढ़ियों के लिए सुविधाएं जुटा जाते हैं।
 
बेटियां का जन्म तो घर से सिर्फ विदा लेने के लिए होता है। मायके से ससुराल और ससुराल से मायके। बेटियों को लेकर मां-बाप के अरमान जमीन या फ्लैट जैसे नहीं होते। लेकिन एक अच्छे वर के साथ मोटे दहेज की चिन्ता जरूर रहती है। यह चिंता  शायद बेटी के जन्म के बाद से ही हो जाती है। दो बेटियों से भरे घर में सिर्फ एक बेटे के ना होने से मां-बाप को लगता है इतना बड़ा घर और रहने वाला कोई नहीं। उस वक्त घर में बेटियों की गिनती न के बराबर होती है।मां-बाप हमेशा मुरझाए रहते हैं जैसे जीवन में कोई रस ही नहीं। पड़ोसिन से बात करते हुए मां अक्सर रो दिया करती जैसे एक बेटे के बिना वह कितनी बेबस कितनी लाचार है। बेटा होता तो वह एक नहीं कई बार मुहल्ले की औरतों से पूछती कहां खरीदी नई जमीन, कितने का लिय़ा नया फ्लैट।.क्या घर और जमीन की जरुरत बेटियों को नहीं पड़ती?

बुधवार, 26 मार्च 2014

'बस' एक सनम चाहिए..



बस चल रही है। जितने बैठे हैं उससे कहीं ज्यादा खड़े हैं।पुरुष हैं, महिलाएं हैं, बच्चे हैं। कोई कहीं जा रहा है तो कोई कहीं। किसी को जल्दी पहुंचने की हड़बड़ी है तो कोई फुरसत को पीठ पर टांगे चल रहा है। कोई घर से बिना खाए निकला है तो कोई झगड़ा करके। जितने लोग उतने तरह की स्थितियां-परिस्थितियां। ड्राइवर गाने बजा रहा है। अल्का याज्ञनिक की आवाज के साथ कभी कुमार सानू तो कभी उदित नारायण को बदल रहा है। वह अपने मनचाहे गीत सुन रहा है। कुछ यात्री बजते हुए गाने के साथ गुनगुना रहे हैं तो कुछ की उंगलियां गाने की धुन पर सीट पर ही नाच रही हैं। किसी को गाने से सिर दर्द हो रहा है तो किसी को गाना बेहद उबाऊ लग रहा है।

 एक अपने बगल वाले के कहता है..इससे अच्छा होता कि कोई भक्ति गाना बजाता। दो लड़के कह रहे हैं.. लगता है इसके पास नए गानों का कलेक्शन नही है। कोई बिरहा सुनने की इच्छा जता रहा है जो ड्राइवर तक पहुंच नहीं रही है तो कोई..जो कि नींद में बार-बार अपना सिर बगल वाले के कंधे पर पटक रहा है, बुदबुदा रहा है कि साला ई का बजा रहा है..भनन-भनन लगाया है, नींद टूट जा रही है। 
दो-चार लोग उबकर जो कि मल्टीमीडिया मोबाइल के साथ ईयर फोन लेकर बैठे हैं, कान में खोंसते हैं और ढिच्चक..ढिच्चक सुनने लगते हैं। जो लोग ड्राइवर की पसंद को झेल रहे हैं उनके पास कोई और चारा नहीं है। ड्राइवर के साथ बेवफाई हुई है..उसका सनम उसे छोड़ कर चला गया है। ड्राइवर पचास किलोमीटर की दूरी के हिसाब से बेवफाई और बिछड़े सनम जैसे गानों को इकट्ठा कर के रखा है। बस में बैठे लोग यह उम्मीद लगाए बैठे हैं कि पांच-दस किलोमीटर तक एक के बाद एक ऐसे गाने बजने के बाद शायद सनम की जुदाई का भूत उतरे और गाना बदल जाये लेकिन प्रति किलोमीटर की रफ्तार से उम्मीदों पर पानी फिरता जा रहा है। 
 बस का माहौल बेवफाई मय हो गया। लोग चिड़चिड़ेपन का आंसू पीकर रह गए। बस जब अपने ठिकाने पर पहुंची तो सभी लोग भरभरा कर निकले।

सोमवार, 24 मार्च 2014

आवारा हैं..हर जगह हैं..






एक रसोई ऐसी भी..


जब तक है सांस..


आस्था..

गिनिए तो कितने नारियल हैं!!!

इससेे क्या होता है भाई!!

इतने आशीर्वाद कहां से लाऊं!!

ये भी आस्था है..

यूं ही..

दो दीवाने सारनाथ में..

पेड़ सेेेे गिरकर झाड़ी पर अटके..