कल बाजार से सब्जी लेकर
लौटते वक्त एक ठेले पर चाट खाने के लिए रुकी। एक आंटी जी ठेले वाले को कह रही थी
वो ब्रदर चाट में ऑनियन कितना कम डाले हो खाने में मजा नहीं आ रहा है।
चाट खाने वाली आंटी जी
हमारी परिचित थीं। हमने कहा क्या बात है आंटी जी, आजकल अंग्रेजी के शब्दों का
ज्यादा इस्तेमाल कर रही है। हालांकि यह बात मैने मज़ाक में कही, लेकिन आंटी जी
बिल्कुल सीरियस हो गयीं और बोलीं- अंग्रेजी माध्यम के एक स्कूल में गोलू का नाम
लिखाया है। तुम तो जानती हो कि हमलोग कम पढ़े लिखे है, औऱ अंग्रेजी तो बिल्कुल
पल्ले नही पड़ती। जैसे-तैसे करके पैरेन्टस मीटिंग में जाती हूं, वो भी अकेले।
तुम्हारे चाचा साथ तो जाते हैं लेकिन स्कूल के गेट पर ही खड़े रहते हैं।
मुहल्ले वाले खिल्ली उड़ाते हैं कि भाई फैशन चल दिया है, आजकल हर कोई अपने बच्चे का दाखिला अंग्रेजी माध्यम के स्कूल में करा दे रहा है।
हम बस यही चाहते हैं कि
हमारा बच्चा अच्छे स्कूल से पढ़ाई करे। इसके लिए हम मोहल्ले ही नहीं बल्कि स्कूल
से गोलू की टीचर से भी डांट सुनते हैं। मैं उसकी स्कूल डायरी नहीं पढ़ पाती लेकिन
उसे अंग्रेजी में बात नहीं कर पाती लेकिन सिर्फ इतने से ही क्या मेरा बच्चा स्कूल
ना जाए।
देखा जाय तो आंटी जी कि
चिंता जायज थी। सामाजिक मुद्दों पर कलम चलाने वाले एक सज्जन से जब मैने इस मुद्दे
पर बात की तो उन्होंने कहा कि इंसान चाहे
किसी भी परिस्थिति में गुजारा करता हो लेकिन अपने बच्चों के लिए हमेशा बेहतर
विकल्प ढूढ़ता है। कम या बिल्कुल भी ना पढ़े-लिखे लोग भी यह बात बखूबी जानते हैं
कि आज अंग्रेजी माध्यम के शिक्षा की ज्यादा मांग है।
लेकिन बच्चों को अंग्रेजी
माध्यम में शिक्षा देना एक स्टेटस सिंबल भी बन गया है। आंटी जी से उनके मुहल्ले
वालों को इसलिए चिढ़ है कि उनके पति महज एक मोबाइल फोन की दुकान चलाकर अपना खर्च
चलाते हैं लेकिन बच्चे को अंग्रेजी माध्यम के स्कूल में पढ़ा रहे हैं। साथ ही यह
भी एक कारण है कि जो मां-बाप ठीक से हिंदी बोलने में असमर्थ हैं उनका बच्चा
अंग्रेजी स्कूलों के बस में में बैठकर जाता है तो लोगो को खटकता है।
जिस हिसाब से चीजें बदल रही
हैं, लोगों की मानसिकता भी वैसे ही परिवर्तित हो रही है। पिता कहता है कि हम जीवन
में कुछ नहीं कर पाए तो क्या हुआ हम अपने बच्चे को बेहतर शिक्षा देकर बड़ा आदमी
बनाएंगे, इसके लिए वह दिन रात परिश्रम भी करता है। लेकिन समाज के परिहास से बच
नहीं पाता।
कुछ लोग जो अपने को
मध्यमवर्गीय मानते है वह निम्न मध्यमवर्गीय लोगों को अपने से बेहतर हालत में देखना
कम पसंद करते हैं। यहां सिर्फ बच्चे के अंग्रेजी माध्यम के स्कूल में पढ़ने की ही
बात नहीं है। बल्कि उनके अच्छे रहन-सहन से भी अन्य लोगों को कोफ्त होती है।
मैने आंटी जी को समझाया कि
मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। हम जिस समाज में रहते हैं उसमें भांति-भांति के लोग
हैं, सबकी अपनी सोच है। आप सोचती हैं कि आपका बच्चा बेहतर शिक्षा प्राप्त करें
लेकिन समाज सोचता है कि आप अपने औकात से बाहर का काम कर रही है। आप घबराइए नहीं
लोगों का सामना करिए, जब लोग कहते हैं तो आप उनको भी अपने बच्चे की अच्छी शिक्षा
पर ध्यान देने के लिए कहिए।
औऱ हां...अपनी अंग्रेजी
सीखने की ललक यूं ही जारी रखिए, इससे अपने बच्चे के होमवर्क में मदद तो मिलेगी ही
मुहल्ले की बाकी औऱतों को भी सीख मिलेगी।
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