Friday, 12 December 2014

बियाह का कैसट



बुआ..दरवाजा कोलो....
कोलो जी...
खट्ट..खट्टट..धम्म...धम्म..

(..और जब मैंने दरवाजा खोला..)

इतने देर से दरवाजा कटकटा रही थी में..तुम कोली नहीं..
-खोल तो दिया बेटा...अंदर आ जाओ
नहीं...अंदर नहीं आना मेने..
चलो मेरे पापा के बियाह का कैसट लगा है टीबी में..
सभ लोग देक रहा है...तुम भी देक लो..

(उसकी बातें सुनकर जाने क्यों मेरी हंसी छूट गई)
मेरे हंसते ही उसका चेहरा जाने कैसा बन गया....
वो सकपकाई हुई सी मुझे ऐसे देख रही थी..जैसे मैंने उसकी कोई चोरी पकड़ ली हो...

मैंने कहा- तुम चलो..मैं दो मिनट में आती हूं...
वो पैर पटकते हुए चली और बोली- आओ चाहे मत आओ..फिर ना कहना अपने पापा के बियाह को मेने टीबी पर नहीं दिकाया...
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