Wednesday, 11 May 2016

कितना मिनट लगता है सबकुछ बदलने में!



आज सिर्फ पंद्रह मिनट ही तो लेट हुई थी मॉर्निंग वॉक के लिए। पिछले पंद्रह दिनों से एक ही समय पर सुबह वॉक के लिए निकलती थी। लेकिन आज पूरे पंद्रह मिनट लेट थी।

हॉस्टल से बाहर सड़क पर निकली तो जाने कैसा-कैसा सा तो लग रहा था। उस पंद्रह मिनट में बिखरा वह उजाला बर्दाश्त नहीं हो रहा था। बार-बार मन कर रहा था वापस लौट जाऊं। लेकिन मन में यह भी खयाल आ रहा था कि सिर्फ पंद्रह मिनट ही तो लेट हूं। अगर वापस लौट गई तो मन दिनभर उदास सा रहेगा। जैसे सुबह का कोई बड़ा वाला काम मिस कर दिया हो।

हम जब कोई भी काम रोजाना एक ही समय पर करते हैं तो उस काम की हमें आदत हो जाती है। जैसे मुझे आदत पड़ गई है रोजाना उस बूढ़े अंकल को देखने की, उस नानी जैसी बुढ़िया को लंगड़ाते हुए वॉक करते हुए देखकर कुछ सीखने की। अमलताश के ताजे फूल जो सुबह सड़क पर बिखरे होते हैं उनपर पैर रखकर माता सीता की तरह महसूस करने की।

हॉस्टल से निकलकर जब सड़क पर आई तो वह मोटी लड़की आज वहीं मिल गई जो रोजाना मुझे यूनिवर्सिटी के सामने वाले एटीएम के पास मिलती थी। चाय वाले अंकल अब तक जाने कितने कुल्हड़ चाय बेच चुके थे। एटीएम मशीन की निगरानी करने वाला गार्ड जग चुका था और सड़क किनारे ब्रश कर रहा था (बाकी दिनों वह गार्ड सोया रहता था)।

लल्ला चुंगी चौराहे पर दो ऑटो सवारियों के इंतजार में खड़े थे। रोजाना जब मैं पंद्रह मिनट लेट नहीं होती थी तो इन जगहों पर सन्नाटा रहता था। मैं बार-बार अपनी घड़ी देख रही थी..मुझे कॉन्फिडेंस नहीं आ रहा था...मन में बार-बार यही चल रहा था कि मैं लेट क्यों हो गई। कितना अजीब लग रहा है सबकुछ। उस पंद्रह मिनट के बीच फैले उजाले में यह सब देखने की आदत नहीं थी मुझे। मैं हवा और फूलों की खूशबू को महसूस करते हुए रोजाना मीना कुमारी वाले मूड में निकलती थी। लेकिन आज मुझे कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा था।

प्रयाग स्टेशन से आगे आईआरटी वाली रोड पर आ गई थी अब। बॉटनिकल गॉर्डन के एक पेड़ पर बैठा वह मोर जो रोजाना मेरे वहां पहुंचते ही बोला करता था शायद आज पहले ही कुछ बोल चुका था । गार्डन के पास पहुंचते ही मैंने कई मोर देखे..लेकिन कोई भी मोर कुछ नहीं बोला। मैं मायूस हो गई। मैंने मन ही मन कहा..मोर मोर बोलो न...आगे कुछ और बोलती तो बच्चों के पढ़ने लायक मोर पर कोई कविता ही बन जाती।

रास्ते में आनंद (राजेश खन्ना) टाइप एक अंकल दो-चार बूढ़े अंकल से गले मिल रहे थे। तीन दिन पहले उन्होंने रास्ते में मुझे नमस्ते बेटा बोला तो मैंने भी नमस्ते बोल दिया था। फिर यह सिलसिला जारी हो गया। वह बिल्कुल हंसमुंह और जिंदादिल पात्र हैं, किसी भी अजनबी से बात करके हंसा देना उनके स्वभाव में शामिल है। वह मुझे फिल्म आनंद के आनंद की तरह लगे। जिस दिन उन्होंने मुझे नमस्ते बोला..मैं उन्हें नहीं जानती थी..लेकिन अब जानती हूं आनंद के नाम से।
आगे की सड़कें और सुंदर थी। दोनों तरफ सुंदर से पेड़ और पाथ-वे पर बैठने के लिए सुंदर सी सीटें। सड़क के किनारे एक रामदेव अपनी गर्लफ्रेंड को योगा सीखा रहे थे। गर्लफ्रेंड बोल रही थी..यह क्या सीखा रहे हो। हाथ झनझना जा रहा है। रामदेव जवाब दे रहे थे..यह वाला योगा करने से ब्लड सर्कुलेशन तेजी से होता है। रामदेव नंगे बदन नहीं थे। हॉफ टीशर्ट और बरमूडा पहने हुए थे।
आज वॉक करते हुए मैं किसी को पीछे नहीं छोड़ पा रही थी। पीली साड़ी और स्पोर्ट्स का शूज पहने एक बुढ़िया भी मुझसे आगे निकल गई। मुझे अपने पर तरस आ रहा था..बेटा बेमन कोई काम ऐसे ही होता है।

पंत हॉस्टल के पास आज कुछ अधेड़ जवान योगा कर रहे थे। लाल पैंट और हाथ में कड़ा पहना वह पतला लड़का जो वहां रोज कूदा करता था आज स्थान बदल दिया था।
स्कूल बसें सड़क को कुचलते हुए आगे निकल जा रही थी। वह आंटी जिनके चेहरे पर हमेशा बारह बजे रहते हैं वो तो आज यहीं मिल गईं। रोजाना वह एनसीसी वाले रोड पर मिलती थी। अब मुझे अंदाजा लग रहा था कि मैं कितनी देर से निकली हूं...दुनिया समय पर थी।

मैं अब एनसीसी वाली रोड पर आ चुकी थी। सड़क किनारे कामता देव मंदिर का पुजारी आरती कर चुका था और सड़क पर खड़ा होकर अंगड़ाई ले रहा था।

आर्मी से रिटायर्ड वह अंकल जो रोजाना उस सड़क पर मुझे पछाड़ते हुए उसैल वोल्ट की रफ्तार से आगे निकल जा रहे थे...वे आज इतने आगे निकल चुके थे कि अपन को खुद में दूरदृष्टि दोष की आशंका हो रही थी। छोटे-छोटे किसान साइकिल पर सब्जी बांधे मंडी जा रहे थे। वह बूढ़ा आदमी जो रोजाना मोबाइल फोन को जेब में रखकर हनुमान चालीसा सुनते हुए वॉक करते थे आज मोबाइल नहीं दिखी उनकी।

प्रवेश भवन के पास से जूही-और चंपा जैसे फूलों की खुशबू भी नहीं आ रही थी आज। मानों मुझसे पहले ही कोई आकर इन फूलों की सारी खुशबू चुरा ले गया हो। वह लड़का जो नहा नोकर सिर में ऑलमंड्स ऑयल लगाकर साइकिल के पीछे की सीट पर अपने पापा को बिठाकर रोजाना कहीं जाता था शायद आज निकल चुका था। मैं बैंक रोड पर आ चुकी थी। वहां काफी भीड़ दिख रही थी। कई लोग वॉक करके लौट रहे थे। हॉस्टल पहुंची तो गार्ड अंकल अपने लिए नाश्ता बना रहे थे...मुझे देखकर बोले—लगता है आज देर से निकली थी...मैंने कहा...सब कुछ बदल गया था आज।
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