मंगलवार, 14 जनवरी 2014

हमारी और सबकी मकर संक्रांति...


कटी..कटी..अरे उधर गई...अरे वहां गिरी...की चिल-पों मुहल्ले में सुबह से मची थी। कटी पतंग सबसे पहले लूटने की होड़ में बच्चे गलियों में एक साथ दौड़ लगा रहे थे। उनके जूतों की खटर-पटर की तेज आवाज से ऐसा लग रहा था.. मानों कहीं परेड चल रही हो। कुछ बच्चों को पतंग खरीदने की जरुरत नहीं पड़ी तो कुछ को सस्ते दाम पर पतंग मिल गई।

जिन बच्चों को पतंग खरीदने की जरुरत नहीं पड़ी वे कटी हुई पतंगो को इकट्ठा करके उनमे से मनचाही पतंग उड़ा रहे थे और कुछ बच्चों में इसे सस्ते दाम पर बेंच कर मुनाफा भी कमा रहे थे।

बच्चों की मां उन पर चिल्ला रही थी कि कम से कम मकर संक्रांति के दिन तो समय से नहा-खाकर पतंग उड़ाओ नालायकों..बच्चों के साथ उनके पापा भी पतंग उड़ाने के अपने छिपे हुनर का प्रदर्शन कर रहे थे, लेकिन बच्चों से आगे नहीं निकल पाए।

कई घरों की छत पर बाप-बेटे में पतंग उड़ाने की कला का सेमीफाइनल और फाइनल दौर भी हुआ..लेकिन पलड़ा बेटों का ही भारी रहा..खैर इस पर उम्र की कोई मार नही थी।

पड़ोस की आंटी नहा-धोकर लोटे में जल भरकर छत पर खड़ी आंख दबाकर आसमान में सूरज को खोज रहीं थीं, मानोँ आज सूरज इन्हें चकमा देकर दक्षिण से निकलने वाला हो।
आंटी की बेटी अपने घर के दरवाजे पर बल्टे वाले से पांच लीटर दूध नपवा रही थी। खीर बनाने के लिए नहीं.. बल्कि चूड़ा-दूध खाने के लिए।

और इधर मेरे घर.. दादी इस बात को लेकर बवाल काट रही थीं कि अगर मकर संक्रांति के दिन गाय-भैंस को नहीं नहलाया गया तो अगले जनम भी जानवर के रुप में ही वे धरती पर पैदा होंगे..जबकि वह ऐसा कतई नहीं चाहती। भाई ने कहा- इतनी कड़ाके की ठंड में इंसानों का गुजारा ही नहीं चल रहा, क्यों जानवरों को नहलाकर तकलीफ दी जाय?...लेकिन दादी अपनी बात पर अड़ी रहीं कि घर के जानवरों को नहलाकर उन्हें तिलकुट खिलाया जाए।

इस पर भाई ने कहा- कहिए तो जानवरों को हांक कर संगम नहला लाएं। अगले जनम तक ये आपका एहसान मानेंगे। इस पर दादी तुनककर मुंह टेढ़ा कर बैठ गईं और कुछ न बोलीं।
हम छत पर खड़े होकर गुड़ और तिल के बने अटर-पटर सामान खाते रहे और आसमान में हवा खाती रंग-बिरंगी पतंगों को निहारते रहे।


और अंत में.....स्वाद भले ही अलग रहा हो लेकिन मकर संक्रांति के दिन सबके घर एक ही चीज बनी...और बन जाने पर कहा गया.. खिचड़ी खा लो, नहीं तो ठंड़ी हो जाएगी।

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