Friday, 15 July 2016

सब्जी ए..सब्जीए!



कॉलोनी और मुहल्लों में घूमकर सब्जी बेचने वाले सब्जी वालों की अपनी एक खास स्टाइल होती है। उनके आवाज लगाने के तरीके को पहचान कर आंटियां घर से निकलकर गेट पर आ जाती हैं कि उनका सब्जी वाला तो आ गया।

मुहल्ले कॉलोनी में तो सुबह से लेकर दोपहर तक वैसे तो कई सब्जी वाले आते हैं लेकिन हर घर में हर एक आंटी का अपनी पसंद के ठेले वालों से सब्जी खरीदना फिक्स रहता है। कुछ आंटियों का तो ठेले वालों से उधारी भी चलती है। फिर भी सब्जी बेंचने वालों में इस बात का कॉम्पटिशन रहता है कि वे मुहल्ले में एक-दूसरे से जल्दी पहुंचे।

घूमकर सब्जी बेचने वालों में कुछ बड़े सब्जी वाले होते हैं तो कुछ छोटे। कुछ ठेले वाले सिर्फ सीजन की ही सब्जियां बेचते हैं इससे ज्यादा उनके पास कुछ नहीं रहता। ऐसे ठेले वालों को कॉलोनी की आंटियां ज्यादातर शाम को भाव देती हैं क्यों कि शाम में एक-दो ठेले वाले ही सब्जी बेचने आते हैं औऱ सस्ते में बेंचकर लौट जाते हैं। दूसरे किस्म के ठेले वाले सीजनल सब्जियों के अलावा गोभी, गाजर और पत्तागोभी जैसी सब्जियां भी बेचते हैं जो काफी महंगे होते हैं, वे सब्जियों को हाथ नहीं लगाने देते और खुद उठाकर तौलते हैं। तीसरे तरह के ठेले वाले महंगी और सस्ती सब्जियों के साथ फल भी बेचते हैं । वे बाकी दोनों सब्जी वालों से कुछ ज्यादा इतराते हैं।
सुबह सब्जी वाले की ऊंची आवाज सुनकर ही नींद खुलती है। वह कॉलोनी में घुसते ही जोर-जोर से बोलने लगता है..सब्जी ए..सब्जीए...। उसकी बुलंद आवाज सुनकर ऐसा लगता है मानों वह सब्जी ए..सब्जीए नहीं बल्कि बोल रहा हो..सोने वालों जाग जाओ।

पचास लड़कियों वाला अपना हॉस्टल ज्यादातर सब्जी ए..सब्जीए से सब्जी खरीदना पसंद करता है। बाकी हरी सब्जी है...सब्जी और फल ले लो..कहकर सब्जी बेचने वाले ठेले वाले लाइनअप होते हैं। सब्जी ए..सब्जीए कहकर सब्जी बेंचने वाले को लड़कियां ज्यादा पसंद करती हैं..वजह वह लड़कियों को बताता रहता है कौन से जगह जाने वाली कौन से ट्रेन की टाइमिंग क्या है..कौन सी ट्रेन में राहत रहती है..कौन सी ट्रेन का कितना किराया है...इसके साथ ही कौन सी सब्जी में क्या डालकर पकाया जाए कि वह ज्यादा स्वादिष्ट बनें। और अंत में यह भी कह देता है कि बहन यदि खुल्ले पैसे नहीं हैं तो कल दे देना। इतना प्रोपेगेंडा काफी होता है लड़कियों के दिल में जगह बनाने के लिए।

ऐसा नहीं है कि बाकी के ठेले वालों से लड़कियां सब्जी नहीं खरीदती लेकिन उनके साथ सब्जी लेना और पैसे देना भर मतलब रहता है। कभी-कभी खुल्ले पैसे न रहने पर ठेले वाले मानते नहीं और मकानमालिक से खुल्ले पैसे लेकर ठेले वालों को देना पड़ता है।
ठेले वालों के आने से घर बैठे सब्जियां मिल जाती हैं और कॉलोनी में रौनक बनी रहती है।
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