Tuesday, 27 May 2014

कैसे भी..रास्ते तो निकलते ही हैं!!


आठ-दस साल पहले गांवों में मोबाइल का चलन बहुत कम था। गिने-चुने हुए लोगों के पास बीएसएनएल की सिम लगी हुई नोकिया का मोबाइल फोन था। गांव से साइकिल चलाकर 15 किलोमीटर की दूरी तय करके पढ़ाई करने वाली परास्नातक की एक लड़की काव्या को उसके एक दोस्त ने नोकिया की मोबाइल भेंट की। काव्या उस मोबाइल से सबसे पहले मैसेज भेजना सीखी, और डायरी में लिखी शेरो-शायरी मोबाइल से टाइप कर दोस्तों के नंबर पर भेजती।

 कुछ दिनों बाद उसके फोन से मैसेज जाना बंद हो गया। अब उसकी समझ में नहीं आया कि इसके लिए वह क्या करे। दोस्त से पूछने पर उसने बताया कि कस्टमर केयर में फोन करके समस्या का समाधान पाया जा सकता है।

 उस वक्त रात के बारह बज रहे थे जब कस्टमर केयर में काव्या ने फोन लगाया। उधर बात हुई औऱ समस्या का समाधान भी सुलझा दिया गया लेकिन कस्टमर केयर से बात करने वाले लड़के ने काव्या का फोन नंबर रख लिया और अगले दिन उसे अपने पर्सनल नंबर से फोन किया।

 दोनों बाते करने लगे। धीरे-धीरे बातें बढ़ने लगी औऱ दोनो को एक दूसरे से प्यार हो गया। बात करते हुए छः महिने बीत गए तब दोनो ने डिसाइड किया कि उनको मिलना चाहिए अगर वे एक दूसरे को पसंद आ गए तो घर वालों से बात करके शादी कर ली जाएगी।

हफ्ते भर के अंदर वह लड़का काव्या के शहर आया। दोनो मिले एक दूसरे को पसंद किए और लड़का वापस चला गया। पंद्रह दिन बाद लड़का अपनी मां औऱ बहन के साथ पुनः आया और काव्या से सगाई करके चला गया।
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फ्लैश बैक-

काव्या एक गरीब परिवार से थी। बच्चों को ट्यूशन पढ़ाकर अपनी परास्नातक की पढ़ाई पूरी कर रही थी। उसके पिता को उसकी शादी की चिन्ता खाए जा रही थी। उसके लिए उन्होंने कई लड़के भी देखे थे लेकिन मोटे दहेज की मांग से उनके हाथ तंग थे। उन्होंने निश्चय किया कि वे अपनी आधी जमीन बेंचकर बेटी का ब्याह करेंगे लेकिन जमीन की बोली लगाने वालों को यह पता चल गया कि किस कारण से जमीन बेची जा रही है । इसका फायदा उठाते हुए खरीददारों ने जमीन की कम कीमत लगाई। ठीक दाम न मिलने के कारण जमीन ना बिक सकी और बेटी का ब्याह रूका रह गया। बेटी की ब्याह की चिंता में डूबे पिता को सारा रात नींद नहीं आती थी।
काव्या के कुछ दोस्त अच्छे थे वे उसे कापी-किताब अपने ही पैसे से खरीद कर दे देते थे और उस दिन उसके एक दोस्त ने उसे मोबाइल फोन भी खरीद कर दे दिया जिसकी जरूरत काव्या को न के बराबर थी।

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सगाई के बाद काव्या ने उस लड़के की चर्चा घर में की। इस बात को सुनते ही उसके पिता बहुत नाराज हुए। लड़का दिल्ली का रहने वाला था। एक गरीब बाप एक अनजान दिल्ली के लड़के से अपनी बेटी की शादी कैसे कर सकता था। पिता को सबसे ज्यादा फिक्र लड़के की बिरादरी को लेकर हुई।

 पिता के कहने पर एक बार फिर लड़के को उसके परिवार सहित बुलाया गया। दोनों के परिवारों ने आपस में बातचीत की। लड़का उन्हीं की बिरादरी का था। बात बन गई और दोनों की शादी हो गई। लड़के ने दहेज के रुप में काव्या के पिता से कुछ भी नहीं लिया और शादी कर उसे लेकर दिल्ली चला गया।

 काव्या के पिता की जमीन बिकने से बच गई।  उसके घरवालों की गरीबी तो नहीं दूर हुई लेकिन उनके घर में जीने खाने का सामान तो है ही। काव्या के भाई के बच्चों को कम से कम स्कूल जाकर पढ़ने का अवसर मिला है। इस तरह काव्या के पिता की फिक्र दूर हुई।


जिंदगी में छत्तीस तरह की परेशानियां होती हैं लेकिन किसी भी काम पर बट्टा नहीं लगता। देर-सबेर भटकते ही सही कोई ना कोई रास्ता मिल ही जाता है। जीवन में आने वाली समस्याएं अपने साथ एक रास्ता लिए ना आतीं तो इंसान निराशा के अलावा किसी औऱ चीज की बातें ही ना करता। समस्याएं औऱ सॉल्यूशन दोनों आसपास ही होते हैं लेकिन हां सब्र उनसे कोसों दूर होता है।
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